समाज में बढ़ रही सुसाइडल टेंडेंसी खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। आजकल छात्र अच्छे मार्क्स ना मिलने के कारण तो कभी फेल होने जैसा जरा सी बात पर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहे हैं। इसके अलाला कई ऐसे ही कारण है जो लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। ये टेंडेंसी केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में बहुत तेजी से फैल रही है,,,, कई बार दिमाग में बहुत परेशान करने वाले विचार उठते हैं, जो मानसिक एवं साइकोलॉजिकल बीमारियों के कारण होते हैं। अगर इन विचारों को रोका या बदला नही गया तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। ऐसे में लोगों को तुरंत मेडिकल हेल्प की जरूरत होती है। ऐसे सुसाइडल विचार दो प्रकार के होते हैं। एक एक्टिव- जिसमें इंसान सुसाइड करने की सोचता है और उसे पूरा करने के लिए प्लान बनाता है। दूसरा पैसिव- इसमें इंसान को सुसाइड करने का विचार तो आता है पर उसके पास हिम्मत नहीं होती। ये दोनों ही तरह के विचारों को अगर एक्सप्रेस करने की सही जगह मिले तो वह ऐसा निगेटिव काम करने से बच सकता है,,,,,,वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या की प्रवृत्ति अब महामारी बनती जा रही है। आत्महत्या करने वालों में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि चार मिनट में एक व्यक्ति जान दे देता है। और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी देश में हर 10 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान दे रहा है। आमतौर पर ये देखा गया है कि पढाई और प्यार में असफलता के बाद आत्महत्या ही युवाओं को अंतिम समाधान नजर आता है। इसमें अभिभावकों के पास समय न होने के साथ ही फिल्म और इंटरनेट अहम भूमिका निभा रहे हैं। सुसाइडल टेंडेंसी वाले इंसानों की समय पर पहचान करना और उनकी कांउसलिंग करना बहुत जरूरी है,,,अगर कोई इंसान उदास, गुमसुम, परेशान और खोया-खोया रहे और सबसे अलग रहना चाहे तो समझ लीजिए कि वो नॉरमल नहीं है,,,इसके साथ अगर कोई खुद को हेल्पलेस, निराश, जीवन को बेकार माने या पहले कभी सुसाइड का प्रयास कर चुका हो तो उसे ड्रग्स और एल्कोहल से दुर रखना चाहिए क्योंकि वो भी ऐसे कदम उठा सकता है। सुसाइड करने वाले की मानसिकता बहुत अलग होती है ये कुछ सेकेंडों का दौर होता है अगर किसी तरह उस समय को टाल दिया जाए तो इंसान सुसाइड करने का इरादा बदल सकता है। भारतीय कानून में आत्महत्या एक सामाजिक अपराध है और ऐसा करने से दूसरे लोगों की मानसिकता पर भी इसका असर पड़ता है। सुसाइड करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और जब कभी भी आपके दिमाग में ऐसे ख्याल आएं तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें। हम लोगों को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि बुरे वक्त का हिम्मत के साथ मुकाबला करना चाहिए क्योंकि ये प्रकृति का नियम है कि इंसान के जीवन में बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त जरूर आता है।
Thursday, September 20, 2012
सुसाइड टेंडेंसी
समाज में बढ़ रही सुसाइडल टेंडेंसी खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। आजकल छात्र अच्छे मार्क्स ना मिलने के कारण तो कभी फेल होने जैसा जरा सी बात पर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहे हैं। इसके अलाला कई ऐसे ही कारण है जो लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। ये टेंडेंसी केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में बहुत तेजी से फैल रही है,,,, कई बार दिमाग में बहुत परेशान करने वाले विचार उठते हैं, जो मानसिक एवं साइकोलॉजिकल बीमारियों के कारण होते हैं। अगर इन विचारों को रोका या बदला नही गया तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। ऐसे में लोगों को तुरंत मेडिकल हेल्प की जरूरत होती है। ऐसे सुसाइडल विचार दो प्रकार के होते हैं। एक एक्टिव- जिसमें इंसान सुसाइड करने की सोचता है और उसे पूरा करने के लिए प्लान बनाता है। दूसरा पैसिव- इसमें इंसान को सुसाइड करने का विचार तो आता है पर उसके पास हिम्मत नहीं होती। ये दोनों ही तरह के विचारों को अगर एक्सप्रेस करने की सही जगह मिले तो वह ऐसा निगेटिव काम करने से बच सकता है,,,,,,वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या की प्रवृत्ति अब महामारी बनती जा रही है। आत्महत्या करने वालों में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि चार मिनट में एक व्यक्ति जान दे देता है। और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी देश में हर 10 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान दे रहा है। आमतौर पर ये देखा गया है कि पढाई और प्यार में असफलता के बाद आत्महत्या ही युवाओं को अंतिम समाधान नजर आता है। इसमें अभिभावकों के पास समय न होने के साथ ही फिल्म और इंटरनेट अहम भूमिका निभा रहे हैं। सुसाइडल टेंडेंसी वाले इंसानों की समय पर पहचान करना और उनकी कांउसलिंग करना बहुत जरूरी है,,,अगर कोई इंसान उदास, गुमसुम, परेशान और खोया-खोया रहे और सबसे अलग रहना चाहे तो समझ लीजिए कि वो नॉरमल नहीं है,,,इसके साथ अगर कोई खुद को हेल्पलेस, निराश, जीवन को बेकार माने या पहले कभी सुसाइड का प्रयास कर चुका हो तो उसे ड्रग्स और एल्कोहल से दुर रखना चाहिए क्योंकि वो भी ऐसे कदम उठा सकता है। सुसाइड करने वाले की मानसिकता बहुत अलग होती है ये कुछ सेकेंडों का दौर होता है अगर किसी तरह उस समय को टाल दिया जाए तो इंसान सुसाइड करने का इरादा बदल सकता है। भारतीय कानून में आत्महत्या एक सामाजिक अपराध है और ऐसा करने से दूसरे लोगों की मानसिकता पर भी इसका असर पड़ता है। सुसाइड करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और जब कभी भी आपके दिमाग में ऐसे ख्याल आएं तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें। हम लोगों को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि बुरे वक्त का हिम्मत के साथ मुकाबला करना चाहिए क्योंकि ये प्रकृति का नियम है कि इंसान के जीवन में बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त जरूर आता है।
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