Thursday, September 20, 2012

सप्तऋषि आश्रम, हरिद्वार



भारत की धार्मिक राजधानी हरिद्वार, यानि कि ऐसा स्थान जहां पहुंचते ही एक अलग सी अनुभूति होती है। ऐसा लगता है मानो भगवान श्री हरि विष्णु के नगर में पहुंच गए हों। जिसके वातावरण में अनुठी पवित्रता और धार्मिकता महसुस होती है। जहां कि फिजाओं में हर पल भगवान के भजन गुंजते रहते हैं। गंगा के निर्मल जल की कल कल ध्वनी हर किसी को मुग्ध कर देती है। साधु-संतों की पावन कुंड नगरी , प्राचीन मंदिर औऱ अनेकों आश्रम, हर एक हरिद्वार की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान है और इस पहचान का एक जीवंत रूप है हरिद्वार का सप्तऋषि आश्रम.....प्रकृति की गोद में बसा ये आश्रम श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ है। इस आश्रम के सामने गंगा नदी सात धाराओं में बहती है। माना जाता है कि जब गंगा नदी पृथ्वी पर बहती आ रही थी तब उनके मार्ग में गहन तपस्या में लीन सात ऋषि आ गए..मां गंगा ने उनकी तपस्या में विघ्न ना डालते हुए स्वंय को सात हिस्सों में विभाजित कर अपना मार्ग बदल लिया......................इसलिए इस आश्रम को सात सागर भी कहा जाता है।
वेद शास्त्रों के काफी खोज बिन के बाद इस ऐतिहासिक स्थान का पुनर्उत्थान किया गया...इस तीर्थ के उद्धार का श्रेय सर गणेश तक को जाता है। स्वतंत्रा पूर्व उन्होने सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के सहयोग से इस आश्रम का निर्माण कराया...देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने इस आश्रम का उद्घाटन किया था...
हरिद्वार से दो कोस की दूरी पर स्तिथ सप्तऋषि आश्रम गंगा के सप्तसरोवर तट पर बना है...यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं...गंगा तट से ऋषिकेश रोड तक फैले इस आश्रम के आस-पास का वातावरण बेहद ही रमणीय है...इस आश्रम में कई मंदिर हैं...इनमें शिवकुंड सरोवर के पास गंगेश्वर महादेव का प्रधान मंदिर सबसे प्राचीन है...मंदिर के द्वार के दोनो तरफ दो सिंह बने हुए हैं...मंदिर के प्रागंण में देवाधिदेव भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा स्थित है...अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण किए भगवान महादेव की रुप की शोभा अलौकिक है...मंदिर की सिढियां सफेद संगमरमर की बनी हुई हैं,,,जिसके दोनों ओर सफेद संगमरमर की बनी हुई दो हाथियां हैं,,,,इन्हे देख कर ऐसा लगता है मानों ये यहां आने वाले हर श्रद्धालु का स्वागत कर रहे हों...      मंदिर के मुख्य पुजा गृह में प्रवेश करते ही भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं....जिसके दर्शन मात्र से भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं...ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ के दर्शन से अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है....मंदिर के भीतरी खम्भों पर परिम्हों और अप्सराओं की बेहद ही खुबसूरत तस्वीरें अंकित हैं...गंगेश्वर महादेव मंदिर में रोजाना सुबह और शाम आरती की जाती है...
अज्ञान को दूर करने वाले गंगेश्वर महादेव मंदिर की परिक्रमा में ही छोटे-छोटे 9 मंदिर बने हुए हैं....इन 9 मंदिरों में  सात मंदिर सप्तऋषियों के हैं...सप्तऋषि मंदिर के बाहरी दिवारों पर प्रतिहारी की मुर्तियां हैं....मंदिर में सप्तऋषियों यानि कश्यप, वशिष्ट, अत्री, विश्वामित्र, जमदाग्नि, भारद्वाज और गौतम ऋषि की प्रतिमाएं स्थापित है...प्रधान गौत्र प्रवर्तक ऋषिओं में सात सप्तऋषियों को मानव जाति का पिता कहा जाता है,,,,यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ये बेहद पूज्यनिय है...इसके अलावा इस परिसर में वशिष्ट पत्नि अरूंधती की भी मुर्ति स्थापित की गई है...ये भी श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धेय है..इसके साथ यहां मां गंगा जी का मंदिर स्तिथ है...मनोहारी मुर्तियों को अपने अंदर संजोए इस मंदिर में आने के बाद श्रद्धालुओं को आत्मिक सुख और शांति मिलती है...मंदिर की भीतरी दिवारों पर स्वामी राम तिर्थ महाराज और गुरूनानक देव जी की भी तस्वीरे हैं...इसके अलावा दिवारों पर श्लोक भी लिखे गएं हैं...जिसमें मां गंगा और हरिद्वार की महिमा का ब्खान किया गया है... गंगेश्वर महादेव मंदिर की दांयी ओर राम पंचायत मंदिर है..मंदिर में श्री राम..............माता सिता....और लक्ष्मण के अलावा.....उनके भाई भरत और शत्रुघ्न की भी प्रतिमा है....यही नही इस मंदिर में भगवान राम के गुरू की भी मुर्ति स्थापित है...सूर्य रंग के सिंहासन पर विराजमान भगवान राम और माता सिता की मनोहर छवि के दर्शन पाकर मन आनन्द से भर जाता है....इस मंदिर में श्रीराम के शिव पूजन की तस्वीर है...अपने आराध्य भगवान शिव की पूजा करते भगवान की ये तस्वीर उनके भक्त रूप को रुपाहित करती है....गंगेश्वर महादेव की बांयी तरफ भगवती दुर्गा मंदिर है....शेर पर सवार मां भगवती भक्तों के दुखों को हरने वाली है,,,,,माता का दिप्त प्रभा मंडल श्रद्धालुओं में ऊर्जा का संचार कर देता है.....मां के मंदिर में भगवान शिव, सिता श्रीराम माता लक्ष्मी के सात चतुर्भुजी भगवान विष्णु और राधा-कृष्ण की तस्वीरें हैं.....जिनके सामने श्रद्धालु पुरी तरह से नतमस्तक हो जाते हैं....इसके अलावा सिता राम के प्रति अपनी अथाह भक्ति का प्रमाण देते श्री हनुमान  जी की भी तस्वीर है....जिसके देख श्रद्धालों के मन में भक्ति की अमृत धारा बहने लगती है....भगवती दुर्गा मंदिर के पास ही कृष्ण मंदिर है,,,,मंदिर में श्री राधा-कृष्ण की अप्रीतम प्रतिमा प्रतिष्ठित है...श्रृंगार से परिपूर्ण उनकी प्रतीमा भक्तो की आंखों से सिधे हृदय में उतर जाती है....इस मंदिर में भी मीनाकारी की अद्भुत मिशाल देखने को मिलती है....मां भगवती और राधा कृष्ण मंदिर के बीच में हनुमान जी का भी एक मंदिर  है.....इस मंदिर में मुकुटधारी हनुमान जी की अलौकिक प्रतीमा स्थित है....उनकी प्रतीमा से शौर्य, तेज और पराक्रम साफ झलकता है.....श्री हनुमान जी की इस मंदिर में धनुष-बाण धारण किए भगवान श्रीराम की बडी ही मोहक तस्वीर है...  इसके प्रभु श्रीराम लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाए हनुमान जी की भी तस्वीर भी यहां है....सप्तऋषिआश्रम में मां सरस्वती का मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है.....सफेद रंग के इस मंदिर में ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतीमा स्थापित है...श्वेत वस्त्र धारिणी, वीणा धारिणी मां सरवस्ती के दर्शन मात्र से ही सारे अवगुण दूर हो जाते हैं...इस आश्रम में श्री गणेश जी का मंदिर स्थित है.....इस मंदिर में चार भुजाओं वाली गजानन की प्रतीमा स्थापित है...प्रथम आराध्य श्री गणेश जी की पूजा से मनुष्य को सारी सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं...शिध्र ही प्रसन्न होने वाले विघ्न विनाशक की श्रद्धालु सच्चे मन से श्रद्धा करते हैं...सप्तऋषि आश्रम में तिरूपति बालाजी का मंदिर भी स्थित है....मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की प्रभावशाली प्रतीमा है....सप्तऋषि आश्रम में आश्रम के उद्धारक औऱ सनातन धर्म के सर्वमान्य नेता सवर्गीय त्यागमुर्ति श्री गोस्वामी श्री गणेशदत्त महाराज की विशाल संगमरमर की मूर्ति है....मूर्ति के सामने ही उनका विशाल कीर्ति स्तंभ है....जो उनकी कठोर तप्सया, त्याग और सेवा भावना का परिचायक है...यहां आने वाले श्रद्धालु आज भी उनके पवित्र आत्मा से प्रेरणा लेते हैं....40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है...इसकी सबसे बडी खासियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी....
40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में एक बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है..इसका उदघाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद ने किया था...1954 में इस यज्ञशाला में वेद मंत्रो से अग्नि प्रज्वलित की गई थी...इसकी सबसे बजी खाशियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी...यहां आने वाले श्रद्धालु हवन कुंड में विधि पूर्वक आहुती डाल कर  अपनी मनोकामना पूरी करते हैं....यहां यज्ञ में आहुती देते कई ऋषियों की तस्वीरें भी हैं.....जो वातावरण में स्वच्छता और पवित्रता का एहसास कराती हैं..यज्ञशाला के अलावा आश्रम में बनी कुटीया भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण हैं...हरे भरे पार्क के बीच बनी यें कुटीयां सप्तऋषियों और उनकी पत्नियों के नाम पर बनी हुई हैं,,,ये कुटीयां साधुओं , महात्माओं और श्रद्धालुओं के भजन, पाठ, योगाभ्यास और स्वाध्याय के लिए बहुत ही अनुकुल हैं... शुरूआत में इन कुटियों की संख्या 14 थीं..लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या बढ़ कर 40 के करीब हो गई हैं...
भक्ति की धारा के साथ ही सप्तऋषि आश्रम में ज्ञान की धारा भी बहती है....और ये धारा बहती है आश्रम में स्थित संस्कृत विद्यालय में...इसका उदघाटन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने किया था....300 से ज्यादा विद्यार्थियों वाले इस महाविद्यालय में प्रथमा से लेकर आचार्य तक की निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है...इसके अलावा विद्यार्थियों को यहां योग की भी शिक्षा दी जाती है...
काशी विश्व विद्यालय से मान्यता प्राप्त इस महाविद्यालय में स्व विद्यार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र और निवास की निशुल्क व्यवस्था है....जिसकी पुरी जिम्मेदारी सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा निभाती है...
 संस्कृत महाविद्यालय के अलावा सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा देशभर में शिक्षा के उत्थान के प्रयासरत है...प्रतिनिधि सभा देश भर में कई इण्टर कालेज और विश्वविद्यालयों का संचालन कर रही है,,,,सनातन धर्म सभा मानव सेवा के अलावा गौ सेवा को भी अहम धर्म मानती है...इस सेवा की ही रूप देखने को मिलता है आश्रम में स्थित गौशाला में...आश्रम में बनी गौशाला में 60 से भी अधिक गाय, बैल और बछड़ों का पालन किया जाता है...इस गौशाला का मकसद गौ सेवा के साथ गौ रक्षा भी है...
 गौ सेवा को हिन्दु धर्म में मातृ सेवा से बढकर माना जाता है,,कहा जाता है कि जिस घर में गौ सेवा की जाती है वहां सदैव खुशियों का बसेरा होता है...

सनातन तकनिकि सभा सामाजिक दायित्यों के निर्वहन में भी हमेशा आगे रहती है...इस आश्रम में प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है....जिसमें विद्यालय के छात्र, आश्रम के कर्मचारी और अतिथियों को मिलाकर लगभग 250 व्यक्तियों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है... सप्तऋषि आश्रम में एक धर्मार्थ औषधालय भी है...जिसमें आश्रम में रहने वाले छात्रों , कर्मचारियों और साधकों के अलावा आस-पास रहने वाले संतो-सन्यासियों और ग्रामिणों का निशुल्क इलाज किया जाता है...हिन्दु धर्म को मानने वालों के लिए सप्तऋषि आश्रम बहुत ही पवित्र स्थल है...माना जाता है कि इस स्थान पर सबसे पहले श्रीमदभागवत की कथा सुनाई गई...कहा जाता है कि सप्तऋषि आश्रम का संबंध हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय से भी है...संसार से विरक्त होने के बाद उन्होने कुछ समय इस पावन धरती पर भी बिताया था....

मानव सेवा, पशु सेवा, पवित्रता, धार्मिकता और श्रद्धा का प्रयाय बन चुके इस आश्रम का मकसद सम्पूर्ण मानव जाति की उन्नती और खुशी है...ऋषिओं के कृपा से बना हरिद्वार का दर्शनिय तिर्थ सप्तऋषि आश्रम पूर्णदायी, पापों को हरने वाला और सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है...ऐसे में इस आश्रम में आने वाले सभी श्रद्धालुओं को आस्था के साथ कभी ना भुलने वाला अदभुत अनुभव प्राप्त होता है...देश-विदेश से सप्तश्रषि आश्रम आने वाले भक्तों को यहां आकर भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। सप्तऋषि आश्रम के लिए यातायात के साधन सुलभ हैं...यहां से सबसे नजदीकी दिल्ली एयरपोर्ट है जो लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर है...सबसे निकटवर्ती रेवले स्टेशन हरिद्वार है, जो यहां से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है, दूसरा रेलवे स्टेशन ऋषिकेश भी महज कुछ किलोमीटर दूर है,  सप्तऋषि आश्रमं तक पहुंचने के लिए हरिद्वार से ऋषिकेश होकर जाने वाली सड़क ही मुख्य मार्ग है, यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...इसके अलावा हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं। यात्रियों को ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं और अतिथि निवास बने हैं, इसके अलावा स्थानीय पंड़ों द्वारा भी यात्रियों के रहने की व्यवस्था होती है ।

No comments: