हिन्दुस्तान का दिल उत्तरप्रदेश...
भारतीय संस्कृति का वो जगमगाता दीपक....जिसकी रोशनी की अलग ही प्रभा और
प्रभाव है....अनेकता में एकता का वो गुलदस्ता.....जिसे प्रकृति ने अपने हाथों से
सजाया है..... जिसका सतरंगी सौंदर्य मनमोहक है.......स्मारक, मंदिर, स्तूप, किले
और महल जिसकी पहचान हैं........कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास, जिसकी
आवोहबा में हर पल तैरती रहती है... जहां लोक-नृत्य और संगीत की रसधारा सहज रुप से
फूटती रहती है..... जिस धरती पर सजती है, संतों की ज्ञान धारा में धर्म की
महफिल.... उसी महफिल का एक मुकाम उत्तरप्रदेश का लखनउ शहर भी है..... ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी...शौर्य, साहस के अनंत जीवंत प्रमाणों का गवाह... अनेक
संस्कृतियों के संगम का केंद्र....सांस्कृतिक विरासत के साथ ही जिसमें आधुनिकता के
रंग भी मिल हुए हैं.. अपने किलों और खूबसूरत मंदिरों के लिए मशहूर लखनउ , आज
भी भक्तों के लिए धर्म और आस्था का अहम पड़ाव है.... और इन्हीं अहम पड़ावों में एक
है....नया हनुमान मंदिर....रामायण काल में लक्ष्मणजी का राज्य रहा लखनउ में स्थित नया हनुमान मंदिर भारत के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है...आदि
काल से ही नया हनुमान जी की महिमा इस जगत में व्याप्त है....लखनउ
के अलीगंज इलाके में स्थित नया हनुमान जी का मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है.....जहां जाति, धर्म और संप्रदाय की सभी सीमाएं टूटती
नजर आती है.....सभी धर्म के लोग जहां एक ही माला में गुंथे होते हैं....चाहे राजा
हो या रंक, इस दर पर सभी शीश झुकाते हैं....इस
दर पर मांगी गई कोई भी दुआ खाली नहीं जाती...यहां आने वाले हर शख्स की मुरादें
पुरी होती है....अभिशप्त आत्माएं यहां मुक्ति पाती हैं....लखनउ का नया हनुमान
मंदिर काफी चमत्कारी माना जाता है...जिसकी वजह से ये स्थान न केवल
उत्तरप्रदेश, बल्कि
पूरे देश में विख्यात है.... इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की मूर्ति किसी कलाकार द्वारा निर्मित नहीं बल्कि धरती से गर्भ
से प्रकट हुई है। मंदिर को देखते ही मन में शांती और सुकुन की एहसास होने लगता है।
मंदिर में रोज हजारों भक्त भगवान के दरबार
में अपनी हाजिरी लगाने आते हैं। इस मंदिर में चौबिंसो घंटे रामायण का पाठ होता
रहता है। बजरंगबली के भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव से स्वंय रामायण का पाठ करते
हैं। भक्तों की सारी मान्यता हनुमान मंदिर में पहुंचते ही पुरी जाती है और भक्त हर
मंगलवार और शनिवार को पुरे परिवार के साथ भगवान के दर्शन को जरूर आते हैं। मंदिर
में होने वाली आरती में बच्चे,
युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी शामिल होते हैं..भगवान की आरती समय स्रोत का
निरंतर पाठ होता रहता है..आरती की दौरान भक्ति के कई रुप देखने को मिलते हैं..कोई
हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा होता है, तो कोई ताली बजा कर प्रभु की भक्ति
में लीन होता है...तो कई भक्त लगातार मंदिर की घंटियों को बजाते रहते हैं.....आरती
खत्म होने के बाद भगवान श्रीराम का आशीर्वाद समझ कर भक्त,
आरती की लौ अपने चेहरे पर लगाते हैं। श्री खेड़ापति को सच्चे
मन चढाया गया कोई भी प्रसाद स्वीकार्य है। परिवार के सुख-शाति की कामना के लिए
रोजाना हवन का भी आयोजन किया जाता है...जिसमें हलवा-पूरी से लेकर कई तरह की
सामग्रियों की आहुति दी जाती है...जिससे हवन की अग्नि पूरी तरह प्रज्जवलित हो उठती
है...जिसकी ज्वाला में सारी उपरी बाधाएं जलकर राख हो जाती है...
अलीगंज में स्थित नया हनुमान मंदिर की बनावट देखने
ही यह प्रतीत होता है कि इस मंदिर का निर्माण सैकड़ों साल पहले किया गया है। मंदिर
के प्रवेश द्वार की बनावट काफी मनमोहक है। जैसे ही मंदिर के मध्य परिसर में भक्त
पहुंचते हैं तो वहां उनकों घंटीयों वाली एक लंबी दिवार देखने को मिलता है। जो कि
पहली ही दृष्टि में काफी मनमोहक लगती है। इन घंटीयों के बारे में मान्यता है कि
इसको बजाने से प्रभु श्री राम भक्तों की पीड़ा-वेदना समझ कर
पवनपुत्र को तत्काल भक्तों के कष्टों के निवारण का आदेश देते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश करने से पहले
ही दिखाई देती है....हनुमानजी के आराध्य प्रभु श्रीराम की प्रतिमा...जो मंदिर के
ठीक बीचो-बीच प्रतिष्ठित है...धनुर्धारी प्रभु राम की ये आकर्षक प्रतिमा यहां आने
वाले श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध करती है और हनुमान जी प्रभु
श्रीराम के चरणो में विराजे हुए हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि कभी
लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस नगरी से बहती हुई गोमती नदी के उस पार 19वीं शताब्दी
में नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी और दिल्ली के मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम
द्वारा बसाये गये अलीगंज मोहल्ले में नया हनुमान मंदिर स्थित है। यहा पर हर ज्येष्ठ
मास के प्रत्येक मंगलवार को हिन्दुओं और मुसलमानों की ओर से श्रद्धा पूर्वक
मनौतियां मानी जाती है और चढावा चढाया जाता है। लखनऊ में मोर्हरम और अलीगंज का
महावीर मेला ये ही दो सबसे बड़े मेले होते हैं। मेले में लगभग एक सप्ताह पहले से
ही दूर-दूर से आकर हजारों लोग केवल एक लाल लंगोट पहने सड़क पर पेट के बल लेट लेट
कर दण्डवती परिक्रमा करते हुए मंदिर जाते हैं। इस मंदिर का इतना महत्व होने से आम
तौर पर लोगों के मन में आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है। 14वीं शताब्दी के आरम्भ में
बख्तियार खिलजी ने इस हनुमानबाड़ी का नाम बदल कर इस्लामबाड़ी रख दिया, जो आज तक
चला आ रहा है। इसके बहुत दिन बाद अवध के त्तकालीन नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम
रबिया के जब कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई औऱ बहुत से हकीम –वैद्यों की दवाइयों
और पीर-फकीर की दुआओं ने भी जवाब दे दिया, तब कुछ लोगों ने उन्हें इस्लामाबाड़ी के
बाबा के पास जाकर दुआ मांगने की सलाह दी। कहते हैं कि वे इस्लामाबाड़ी गई औऱ
सन्तान की कामना की। उनकी अभिलाषा पूरी हुई। लोंगो का मानना है कि जब वे गर्भवती
थीं, तब उन्हें फिर स्वप्न आया, जिसमें उनके पुत्र ने उनसे कहा कि इस्लामाबाड़ी
में उसी जगह हनुमान जी का मूर्ति गड़ी है, उसे निकलवाकर किसी मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। फलत बच्चे के जन्म
के बाद रबिया बेगम वहां गयीं औऱ नवाब के सैनिकों ने टीला खोद डाला तथा नीचे से
मुर्ति निकाल ली गयी। बाद में उसे साफ सुथरा करके, नवाबी आदेश से सोने चांदी तथा
हीरे जवाहरात से सजाकर हाथी
पर रखा गया ताकि आसफुदौला
के बड़े इमामबाड़े के पास ही उसे प्रतिष्ठापित करके मंदिर बनवाया जाय। इस हाथी को
लेकर जब सब जा रहे थे तह सड़क के अंतिम छोर पर पहुंचकर उस हाथी ने आगे बढने से
इन्कार कर दिया। महावत ने लाख कोशिश की लेकिन हाथी ज्यों का त्यों अड़ा रहा। अन्त
में जब उस बाड़ी के साधु ने कहा कि रानी साहिबा हनुमान जी गोमती के उस पार नहीं
जाना चाहते, क्योंकि वह लक्ष्मणजी का क्षेत्र है। तब बेगम साहिबा ने वहीं सड़क के
किनारे, गोमती तट के निकट मुर्ति स्थापित करा दी औऱ उस साधु को सरकारी खर्च पर
मंदिर बनवा दिया। साथ ही उस साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर का महंत नियुक्त तक दिया
गया। मंदिर के लिए उसके आस-पास की अधिकांश जमीन महमूदाबाद रियासत की ओर से मुफ्त
में दे दी गयी।
जहां तक नया हनुमान मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ का सवाल
है, तो यहां बारहों महीनें भक्तों का
तांता लगा रहता है....देश के सुदूर क्षेत्रों से यहां
दर्शानार्थी आते रहते हैं....लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां
विशेष कार्यक्रम होता है...इस विशेष दिन भक्तों की भारी भीड़ यहां हनुमान जी के
दर्शन के लिए आती है...आसपास के लोगों के लिए हनुमान जी का दर्शन उनकी दिनचर्या का
ही हिस्सा है.....भक्त और भगवान का ये मिलन वैसे तो आम बात है, लेकिन, इस मिलन के
बाद भक्तों के चेहरों पर जो संतोष भाव होता है उसे शब्दों
में व्यक्त नहीं किया जा सकता है.....देश के मध्य में
स्थित होने के कारण किसी भी हिस्से से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है....यहां
पहुंचने के लिए सड़क, वायु और रेल
मार्ग को अपनी सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है। लखनऊ का मालनपुर एयरपोर्ट, दिल्ली, मुम्बई, कोलकात्ता
और चेन्नई जुड़ा है। यहां से टैक्सी और बस के माध्यम
से लखनऊ आसानी से पहुंचा जा सकता है और लखनऊ पहुंचने के बाद लोकल सवारियों के
अलीगंज के इस प्राचीन मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। रेल मार्ग से लखनऊ
पहुंचना बहुत ही सरल है... लखनऊ का दिल्ली, मुम्बई और देश के दूसरे शहरों रेल से सीधा संपर्क है... इसके साथ ही लखनऊ देश के कई
शहरों से सड़क मार्ग से भी जुडा हुआ है...अक्टूबर से लेकर मार्च का महीना लखनऊ
जाने के लिए सबसे उत्तम है....
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