Thursday, September 20, 2012

फरीदाबाद का शनि मंदिर


भारत में शनिदेव के कई पीठ है किंतु तीन ही प्राचीन और चमत्कारिक पीठ है, जिनका बहुत महत्व है और इन्ही शनिपीठों में जाकर ही पापों की क्षमा माँगी जा सकती है। विद्वानों का मत है कि उक्त स्थान पर जाकर ही लोग शनि के दंड से बच सकते हैं, किसी अन्य स्थान पर नहीं। जीवन में किसी भी तरह की कठिनाई हो या शनि ग्रह का प्रकोप है, लेकिन यहाँ जाकर लोग भय‍मुक्त हो जाते हैं। हिन्दु मान्यता के अनुसार भक्त को तत्काल लाभ मिलता है। कहते हैं कि पिछले कई हजारों वर्षों से यह पीठ आज भी ज्यों के त्यों है और आज भी यहाँ चमत्कार घटित होते रहते हैं। हमारे देश में केवल तीन ऐसे शनि मंदिर है जिसे शनिपीठ के रूप में जाना जाता है और यहीं जाकर हम अपने गुनाहों की माफी शनि देव से मांग सकते हैं। जिनमें से एक महाराष्ट्र के शिंगणापुर में शनि का प्राचिन मंदिर है वहीं दुसरा मंदिर है शनिचरा मंदिर जो कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पास स्थित है। शनि का तीसरा सिद्द पीठ उत्तरप्रदेश के कोशी से छह किलोमीटर दूर कौकिला वन में स्थित है । इसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहाँ शनिदेव के रूप में भगवान कृष्ण विद्‍यमान रहते हैं और जो भी भक्त इस वन की परिक्रमा करके शनिदेव की पूजा करेगा वहीं कृष्ण की कृपा पाएगा। उस पर से शनिदेव का प्रकोप भी हठ जाएगा। शनि के सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र और इंद्रनीलमणि के समान। यह गिद्ध पर सवार रहते हैं। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहते हैं। शनि को सूर्य का पुत्र माना जाता है। उनकी बहन का नाम देवी यमुना और माता का नाम छाया है। हमारे यहां गलत रित है कि शनिदेव की दृष्टि अगर किसी व्यक्ति पर पड़ती है तो उसका हमेशा बुरा ही होता है लेकिन ये मान्यता सरासर गलत है बल्कि श्री शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे न्यायप्रिय ग्रह हैं, जीवों को उनके कर्मो के आधार पर फल देते हैं। यदि उनकी दया-दृष्टि पानी हो तो अपना कर्म सुधारना चाहिए। ऐसा करने से हमारा जीवन अपने आप सुधर जाएगा। शनि जयंती पर सुख और समृद्धि के लिए श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए। श्री शनिदेव को इस दिन किया गया तैलाभिषेक बहुत ही फलदायी होता है। इससे शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होकर शनिभक्तों को सभी बाधाओं से छुटकारा दिलाते हैं। इस दिन जो भी शनिदेव की पवित्र मन से पूजा-पाठ करता है, उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन गरीब, असहाय व जरूरतमंद लोगों की सेवा व सहायता करने वाले लोगों पर भी श्रीशनिदेव की विशेष अनुकंपा होती है। श्री शनिदेव अपने भक्तों में किसी प्रकार का खोट देखना पसंद नहीं करते। यदि भक्त से कोई खोट होता है तो उसे तुरंत दंड देकर उसकी भूल सुधारने का संकेत देते हैं। याद रहे, शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं। उनकी अनुकंपा पानी हो तो अपना कर्म सुधारें, आपका जीवन अपने आप सुधर जायेगा। शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे हमारे कर्मो के आधार पर फल देते हैं। वे जीवों को उनके कर्मफलों का भुगतान करवाते हैं। इतना ही नहीं, श्री शनिदेव मनुष्य को उसके कर्म बंधनों से मुक्त कर उसका जीवन सार्थक करने का रास्ता भी दिखाते हैं। शनिदेव सौरमंडल के प्रमुख ग्रह हैं। हिदुं धर्म में शनि के प्रभावों को देखते हुए इन्हें भाग्य विधाता भी कहा जाता है। जन्म कुंडली के बारह भावों में श्रीशनिदेव की स्थिति भी किए गए कर्मो के अनुरूप ही होती है। यदि व्यक्ति के कर्म खोटे होते हैं तो उनके फल श्रीशनिदेव उनके अनुरूप ही प्रदान करते हैं। इसके लिए उनपर दोष लगाना उचित नहीं।
 - शनि के पिता और माता सूर्यदेव और छाया है।
- शनि के भाई-बहन यमराज, यमुना और भद्रा है। यमराज मृत्युदेव, यमुना नदी को पवित्र व पापनाशिनी और भद्रा क्रूर स्वभाव की होकर विशेष काल और अवसरों पर अशुभ फल देने वाली बताई गई है।
- शनि शिव को अपना गुरु बनाया और तप द्वारा शिव को प्रसन्न कर शक्तिशाली बने।
- शनि का रंग कृष्ण या श्याम वर्ण सरल शब्दों में कहें तो काला माना गया है।
- शनि का जन्म क्षेत्र - सौराष्ट क्षेत्र में शिंगणापुर माना गया है।
- शनि का स्वभाव क्रूर किंतु गंभीर, तपस्वी, महात्यागी बताया गया है।
- शनि, कोणस्थ, पिप्पलाश्रय, सौरि, शनैश्चर, कृष्ण, रोद्रान्तक, मंद, पिंगल, बभ्रु नामों से भी जाने जाते हैं।
- शनि के जिन ग्रहों और देवताओं से मित्रता है, उनमें श्री हनुमान, भैरव, बुध और राहु प्रमुख है।
- ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक कुम्भ और मकर शनि की प्रिय राशियां है।
- शनि को भू-लोक का दण्डाधिकारी व रात का स्वामी भी माना गया है।
- शनि का शुभ प्रभाव अध्यात्म, राजनीति और कानून संबंधी विषयों में दक्ष बनाता है।
- शनि की प्रसन्नता के लिए काले रंग की वस्तुएं जैसे काला कपड़ा, तिल, उड़द, लोहे का दान या चढ़ावा शुभ होता है। वहीं गुड़, खट्टे पदार्थ या तेल भी शनि को प्रसन्न करता है।
- शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि को अनुकूल करने के लिये नीलम रत्न धारण करना प्रभावी माना गया है।
- शनि के बुरे प्रभाव से डायबिटिज, गुर्दा रोग, त्वचा रोग, मानसिक रोग, कैंसर और वात रोग होते हैं। जिनसे राहत का उपाय शनि की वस्तुओं का दान है।
- शनिश्चरी अमावस्या के दिन लोहे के बर्तन में तेल भरकर उसमें 7 दाने काले चने के, 7 दाने जौ के, 7 दाने काली उड़द के तथा सवा रुपया रखकर उसमें अपना मुंह देखकर दान करें या शनि मंदिर में रख दें।
- शनिवार के दिन काले भैंसे या घोड़े को काले चने खिलाएं।
- शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर सात परिक्रमा करें और सात बूंदी के लड्डू काले कुत्ते को खिलाएं।
- योग्य ज्योतिषी से राय लेकर शनि रत्न नीलम गाय के कच्चे दूध व गंगाजल में पवित्र कर धारण करें।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव कश्यप वंश की परंपरा में भगवान सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शनि को काश्यपेय नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि श्री शनिदेव की उत्पत्ति महर्षि कश्यप के काश्यपेय यज्ञ से हुई थी। सूर्य देव की द्वितीय पत्नी छाया के गर्भ से जन्में शनि के श्याम वर्ण को देख कर सूर्य ने अपनी पत्नी पर आरोप लगायें और शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया । तभी से शनि देव अपने पिता सूर्य से शत्रुभाव रखते हैं। इन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या पर अनेक शक्तियां प्राप्त की और नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया । यमराज शनिदेव के भाई और यमुना बहन हैं । भाई दूज पर यमुना स्नान करने वाले भाई बहनों को शनि और यमराज की पीड़ा नहीं सताती । स्वभाव से गम्भीर त्यागी, तपस्वी, हठी, क्रोधी शनिदेव न्यायप्रिय हैं और हनुमान, काल भैरव, बुध और राहू के मित्र हैं तथा कुम्भ और मकर इनकी प्रिय राशि है । शनि देव व्यक्ति के सुख और स्वास्थ्य पर भी अपने ढंग से प्रभाव डालते हैं । पुराणों के अनुसार शनि को परमशक्ति परमपिता परमात्मा ने तीनों लोक का न्यायाधीश नियुक्त किया है। शनिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उनके किए की सजा देते हैं और ब्रह्मांड में स्थित तमाम अन्यों को भी शनि के कोप का शिकार होना पड़ता है। पुराणों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय करता है तो वह शनि की कोप से बच नहीं सकता।  शनि के शुभ प्रभाव से लम्बे समय तक सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हैं, जबकि अशुभ प्रभाव होने पर व्यक्ति को दुख, मानसिक प्रताड़ना, दरिद्रता , भय तथा पेट, आंख , दांत रोगों के साथ ही अंग-भंग जैसे दु:ख झेलने पड़ते हैं। इसके अलावा शराब पीने वाले, माँस खाने वाले, ब्याज लेने वाले, पराई स्त्री के साथ दुराचार करने वाले और ताकत के बल पर किसी के साथ अन्याय करने वाले का शनिदेव 100 जन्मों तक पीछा करते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार शनिदेव मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। यह धरती और शरीर में जहाँ भी तेल और लौह तत्व है उस पर राज करते हैं। शरीर में दाँत, बाल और हड्डियों की मजबूत या कमजोरी का कारण यही हैं। शनिदेव से सभी डरते हैं क्योंकि ज्योतिष के अनुसार शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के फेर में फँसे व्यक्ति की जिंदगी में तूफान खड़े हो जाते हैं। कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी सभी बाधाओं से मुक्ति का यह सबसे उपयुक्त अवसर है। शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना और काली वस्तुओं का दान करना विशेष शुभकारी माना गया है । शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या पर शनि तीर्थ सिद्ध शनिदेव मंदिर पर विशाल मेला का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के लाखों श्रध्दालु आते हैं । शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना करने से शनि देव विशेष फल देते हैं । यदि निश्चल भाव से शनिदेव का नाम ही ले लिया जाये तो व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं, जो व्यक्ति के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का फैसला सुनाते हैं।
उत्तर प्रदेश के कोशी में स्तिथ श्री शनिपीठ मंदिर श्री कृष्ण की जन्मस्थलि मथुरा से 25-30 किलोमीटर दुर है। और मथुरा दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर तथा आगर से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देश भर से शनिभक्त यहां रेल, वायु और सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। कोशी पहुंचने के लिए भक्तों के लिए मथुरा पहुंचना सबसे सरल है और फिर यहां से प्राइवेट और निजि गाडियों से कोशी पहुंचा जा सकता है। रेलमार्ग से आप मथुरा, आगरा और दिल्ली तक आसानी से पहुंचा जा सकता है और यहां पहुंच कर आप सड़क मार्ग से यहां तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा मथुरा रेलवे स्टेशन कोशी के काफी पास में है यहां से आप आटो या टैक्सी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा बस, ऑटो और कई तरह की प्राइवेट टैक्सियां भी चलती हैं दिल्ली, आगरा और मथुरा से शनिमंदिर के लिए चलती हैं। अगर आप वायुमार्ग से यहां पहुंचना चाहते हैं तो दिल्ली और आगरा सबसे नजदीकी एयरपोर्ट हैं और फिर वहां से सड़क मार्ग से कोशी तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

No comments: