Thursday, September 20, 2012

सप्तऋषि आश्रम, हरिद्वार



भारत की धार्मिक राजधानी हरिद्वार, यानि कि ऐसा स्थान जहां पहुंचते ही एक अलग सी अनुभूति होती है। ऐसा लगता है मानो भगवान श्री हरि विष्णु के नगर में पहुंच गए हों। जिसके वातावरण में अनुठी पवित्रता और धार्मिकता महसुस होती है। जहां कि फिजाओं में हर पल भगवान के भजन गुंजते रहते हैं। गंगा के निर्मल जल की कल कल ध्वनी हर किसी को मुग्ध कर देती है। साधु-संतों की पावन कुंड नगरी , प्राचीन मंदिर औऱ अनेकों आश्रम, हर एक हरिद्वार की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान है और इस पहचान का एक जीवंत रूप है हरिद्वार का सप्तऋषि आश्रम.....प्रकृति की गोद में बसा ये आश्रम श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ है। इस आश्रम के सामने गंगा नदी सात धाराओं में बहती है। माना जाता है कि जब गंगा नदी पृथ्वी पर बहती आ रही थी तब उनके मार्ग में गहन तपस्या में लीन सात ऋषि आ गए..मां गंगा ने उनकी तपस्या में विघ्न ना डालते हुए स्वंय को सात हिस्सों में विभाजित कर अपना मार्ग बदल लिया......................इसलिए इस आश्रम को सात सागर भी कहा जाता है।
वेद शास्त्रों के काफी खोज बिन के बाद इस ऐतिहासिक स्थान का पुनर्उत्थान किया गया...इस तीर्थ के उद्धार का श्रेय सर गणेश तक को जाता है। स्वतंत्रा पूर्व उन्होने सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के सहयोग से इस आश्रम का निर्माण कराया...देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने इस आश्रम का उद्घाटन किया था...
हरिद्वार से दो कोस की दूरी पर स्तिथ सप्तऋषि आश्रम गंगा के सप्तसरोवर तट पर बना है...यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं...गंगा तट से ऋषिकेश रोड तक फैले इस आश्रम के आस-पास का वातावरण बेहद ही रमणीय है...इस आश्रम में कई मंदिर हैं...इनमें शिवकुंड सरोवर के पास गंगेश्वर महादेव का प्रधान मंदिर सबसे प्राचीन है...मंदिर के द्वार के दोनो तरफ दो सिंह बने हुए हैं...मंदिर के प्रागंण में देवाधिदेव भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा स्थित है...अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण किए भगवान महादेव की रुप की शोभा अलौकिक है...मंदिर की सिढियां सफेद संगमरमर की बनी हुई हैं,,,जिसके दोनों ओर सफेद संगमरमर की बनी हुई दो हाथियां हैं,,,,इन्हे देख कर ऐसा लगता है मानों ये यहां आने वाले हर श्रद्धालु का स्वागत कर रहे हों...      मंदिर के मुख्य पुजा गृह में प्रवेश करते ही भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं....जिसके दर्शन मात्र से भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं...ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ के दर्शन से अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है....मंदिर के भीतरी खम्भों पर परिम्हों और अप्सराओं की बेहद ही खुबसूरत तस्वीरें अंकित हैं...गंगेश्वर महादेव मंदिर में रोजाना सुबह और शाम आरती की जाती है...
अज्ञान को दूर करने वाले गंगेश्वर महादेव मंदिर की परिक्रमा में ही छोटे-छोटे 9 मंदिर बने हुए हैं....इन 9 मंदिरों में  सात मंदिर सप्तऋषियों के हैं...सप्तऋषि मंदिर के बाहरी दिवारों पर प्रतिहारी की मुर्तियां हैं....मंदिर में सप्तऋषियों यानि कश्यप, वशिष्ट, अत्री, विश्वामित्र, जमदाग्नि, भारद्वाज और गौतम ऋषि की प्रतिमाएं स्थापित है...प्रधान गौत्र प्रवर्तक ऋषिओं में सात सप्तऋषियों को मानव जाति का पिता कहा जाता है,,,,यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ये बेहद पूज्यनिय है...इसके अलावा इस परिसर में वशिष्ट पत्नि अरूंधती की भी मुर्ति स्थापित की गई है...ये भी श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धेय है..इसके साथ यहां मां गंगा जी का मंदिर स्तिथ है...मनोहारी मुर्तियों को अपने अंदर संजोए इस मंदिर में आने के बाद श्रद्धालुओं को आत्मिक सुख और शांति मिलती है...मंदिर की भीतरी दिवारों पर स्वामी राम तिर्थ महाराज और गुरूनानक देव जी की भी तस्वीरे हैं...इसके अलावा दिवारों पर श्लोक भी लिखे गएं हैं...जिसमें मां गंगा और हरिद्वार की महिमा का ब्खान किया गया है... गंगेश्वर महादेव मंदिर की दांयी ओर राम पंचायत मंदिर है..मंदिर में श्री राम..............माता सिता....और लक्ष्मण के अलावा.....उनके भाई भरत और शत्रुघ्न की भी प्रतिमा है....यही नही इस मंदिर में भगवान राम के गुरू की भी मुर्ति स्थापित है...सूर्य रंग के सिंहासन पर विराजमान भगवान राम और माता सिता की मनोहर छवि के दर्शन पाकर मन आनन्द से भर जाता है....इस मंदिर में श्रीराम के शिव पूजन की तस्वीर है...अपने आराध्य भगवान शिव की पूजा करते भगवान की ये तस्वीर उनके भक्त रूप को रुपाहित करती है....गंगेश्वर महादेव की बांयी तरफ भगवती दुर्गा मंदिर है....शेर पर सवार मां भगवती भक्तों के दुखों को हरने वाली है,,,,,माता का दिप्त प्रभा मंडल श्रद्धालुओं में ऊर्जा का संचार कर देता है.....मां के मंदिर में भगवान शिव, सिता श्रीराम माता लक्ष्मी के सात चतुर्भुजी भगवान विष्णु और राधा-कृष्ण की तस्वीरें हैं.....जिनके सामने श्रद्धालु पुरी तरह से नतमस्तक हो जाते हैं....इसके अलावा सिता राम के प्रति अपनी अथाह भक्ति का प्रमाण देते श्री हनुमान  जी की भी तस्वीर है....जिसके देख श्रद्धालों के मन में भक्ति की अमृत धारा बहने लगती है....भगवती दुर्गा मंदिर के पास ही कृष्ण मंदिर है,,,,मंदिर में श्री राधा-कृष्ण की अप्रीतम प्रतिमा प्रतिष्ठित है...श्रृंगार से परिपूर्ण उनकी प्रतीमा भक्तो की आंखों से सिधे हृदय में उतर जाती है....इस मंदिर में भी मीनाकारी की अद्भुत मिशाल देखने को मिलती है....मां भगवती और राधा कृष्ण मंदिर के बीच में हनुमान जी का भी एक मंदिर  है.....इस मंदिर में मुकुटधारी हनुमान जी की अलौकिक प्रतीमा स्थित है....उनकी प्रतीमा से शौर्य, तेज और पराक्रम साफ झलकता है.....श्री हनुमान जी की इस मंदिर में धनुष-बाण धारण किए भगवान श्रीराम की बडी ही मोहक तस्वीर है...  इसके प्रभु श्रीराम लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाए हनुमान जी की भी तस्वीर भी यहां है....सप्तऋषिआश्रम में मां सरस्वती का मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है.....सफेद रंग के इस मंदिर में ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतीमा स्थापित है...श्वेत वस्त्र धारिणी, वीणा धारिणी मां सरवस्ती के दर्शन मात्र से ही सारे अवगुण दूर हो जाते हैं...इस आश्रम में श्री गणेश जी का मंदिर स्थित है.....इस मंदिर में चार भुजाओं वाली गजानन की प्रतीमा स्थापित है...प्रथम आराध्य श्री गणेश जी की पूजा से मनुष्य को सारी सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं...शिध्र ही प्रसन्न होने वाले विघ्न विनाशक की श्रद्धालु सच्चे मन से श्रद्धा करते हैं...सप्तऋषि आश्रम में तिरूपति बालाजी का मंदिर भी स्थित है....मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की प्रभावशाली प्रतीमा है....सप्तऋषि आश्रम में आश्रम के उद्धारक औऱ सनातन धर्म के सर्वमान्य नेता सवर्गीय त्यागमुर्ति श्री गोस्वामी श्री गणेशदत्त महाराज की विशाल संगमरमर की मूर्ति है....मूर्ति के सामने ही उनका विशाल कीर्ति स्तंभ है....जो उनकी कठोर तप्सया, त्याग और सेवा भावना का परिचायक है...यहां आने वाले श्रद्धालु आज भी उनके पवित्र आत्मा से प्रेरणा लेते हैं....40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है...इसकी सबसे बडी खासियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी....
40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में एक बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है..इसका उदघाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद ने किया था...1954 में इस यज्ञशाला में वेद मंत्रो से अग्नि प्रज्वलित की गई थी...इसकी सबसे बजी खाशियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी...यहां आने वाले श्रद्धालु हवन कुंड में विधि पूर्वक आहुती डाल कर  अपनी मनोकामना पूरी करते हैं....यहां यज्ञ में आहुती देते कई ऋषियों की तस्वीरें भी हैं.....जो वातावरण में स्वच्छता और पवित्रता का एहसास कराती हैं..यज्ञशाला के अलावा आश्रम में बनी कुटीया भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण हैं...हरे भरे पार्क के बीच बनी यें कुटीयां सप्तऋषियों और उनकी पत्नियों के नाम पर बनी हुई हैं,,,ये कुटीयां साधुओं , महात्माओं और श्रद्धालुओं के भजन, पाठ, योगाभ्यास और स्वाध्याय के लिए बहुत ही अनुकुल हैं... शुरूआत में इन कुटियों की संख्या 14 थीं..लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या बढ़ कर 40 के करीब हो गई हैं...
भक्ति की धारा के साथ ही सप्तऋषि आश्रम में ज्ञान की धारा भी बहती है....और ये धारा बहती है आश्रम में स्थित संस्कृत विद्यालय में...इसका उदघाटन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने किया था....300 से ज्यादा विद्यार्थियों वाले इस महाविद्यालय में प्रथमा से लेकर आचार्य तक की निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है...इसके अलावा विद्यार्थियों को यहां योग की भी शिक्षा दी जाती है...
काशी विश्व विद्यालय से मान्यता प्राप्त इस महाविद्यालय में स्व विद्यार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र और निवास की निशुल्क व्यवस्था है....जिसकी पुरी जिम्मेदारी सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा निभाती है...
 संस्कृत महाविद्यालय के अलावा सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा देशभर में शिक्षा के उत्थान के प्रयासरत है...प्रतिनिधि सभा देश भर में कई इण्टर कालेज और विश्वविद्यालयों का संचालन कर रही है,,,,सनातन धर्म सभा मानव सेवा के अलावा गौ सेवा को भी अहम धर्म मानती है...इस सेवा की ही रूप देखने को मिलता है आश्रम में स्थित गौशाला में...आश्रम में बनी गौशाला में 60 से भी अधिक गाय, बैल और बछड़ों का पालन किया जाता है...इस गौशाला का मकसद गौ सेवा के साथ गौ रक्षा भी है...
 गौ सेवा को हिन्दु धर्म में मातृ सेवा से बढकर माना जाता है,,कहा जाता है कि जिस घर में गौ सेवा की जाती है वहां सदैव खुशियों का बसेरा होता है...

सनातन तकनिकि सभा सामाजिक दायित्यों के निर्वहन में भी हमेशा आगे रहती है...इस आश्रम में प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है....जिसमें विद्यालय के छात्र, आश्रम के कर्मचारी और अतिथियों को मिलाकर लगभग 250 व्यक्तियों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है... सप्तऋषि आश्रम में एक धर्मार्थ औषधालय भी है...जिसमें आश्रम में रहने वाले छात्रों , कर्मचारियों और साधकों के अलावा आस-पास रहने वाले संतो-सन्यासियों और ग्रामिणों का निशुल्क इलाज किया जाता है...हिन्दु धर्म को मानने वालों के लिए सप्तऋषि आश्रम बहुत ही पवित्र स्थल है...माना जाता है कि इस स्थान पर सबसे पहले श्रीमदभागवत की कथा सुनाई गई...कहा जाता है कि सप्तऋषि आश्रम का संबंध हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय से भी है...संसार से विरक्त होने के बाद उन्होने कुछ समय इस पावन धरती पर भी बिताया था....

मानव सेवा, पशु सेवा, पवित्रता, धार्मिकता और श्रद्धा का प्रयाय बन चुके इस आश्रम का मकसद सम्पूर्ण मानव जाति की उन्नती और खुशी है...ऋषिओं के कृपा से बना हरिद्वार का दर्शनिय तिर्थ सप्तऋषि आश्रम पूर्णदायी, पापों को हरने वाला और सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है...ऐसे में इस आश्रम में आने वाले सभी श्रद्धालुओं को आस्था के साथ कभी ना भुलने वाला अदभुत अनुभव प्राप्त होता है...देश-विदेश से सप्तश्रषि आश्रम आने वाले भक्तों को यहां आकर भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। सप्तऋषि आश्रम के लिए यातायात के साधन सुलभ हैं...यहां से सबसे नजदीकी दिल्ली एयरपोर्ट है जो लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर है...सबसे निकटवर्ती रेवले स्टेशन हरिद्वार है, जो यहां से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है, दूसरा रेलवे स्टेशन ऋषिकेश भी महज कुछ किलोमीटर दूर है,  सप्तऋषि आश्रमं तक पहुंचने के लिए हरिद्वार से ऋषिकेश होकर जाने वाली सड़क ही मुख्य मार्ग है, यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...इसके अलावा हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं। यात्रियों को ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं और अतिथि निवास बने हैं, इसके अलावा स्थानीय पंड़ों द्वारा भी यात्रियों के रहने की व्यवस्था होती है ।

सुसाइड टेंडेंसी



समाज में बढ़ रही सुसाइडल टेंडेंसी खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। आजकल छात्र अच्छे मार्क्स ना मिलने के कारण तो कभी फेल होने जैसा जरा सी बात पर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहे हैं। इसके अलाला कई ऐसे ही कारण है जो लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। ये टेंडेंसी केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में बहुत तेजी से फैल रही है,,,, कई बार दिमाग में बहुत परेशान करने वाले विचार उठते हैं, जो मानसिक एवं साइकोलॉजिकल बीमारियों के कारण होते हैं। अगर इन विचारों को रोका या बदला नही गया तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। ऐसे में लोगों को तुरंत मेडिकल हेल्प की जरूरत होती है। ऐसे सुसाइडल विचार दो प्रकार के होते हैं। एक एक्टिव- जिसमें इंसान सुसाइड करने की सोचता है और उसे पूरा करने के लिए प्लान बनाता है। दूसरा पैसिव- इसमें इंसान को सुसाइड करने का विचार तो आता है पर उसके पास हिम्मत नहीं होती। ये दोनों ही तरह के विचारों को अगर एक्सप्रेस करने की सही जगह मिले तो वह ऐसा निगेटिव काम करने से बच सकता है,,,,,,वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या की प्रवृत्ति अब महामारी बनती जा रही है। आत्महत्या करने वालों में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि चार मिनट में एक व्यक्ति जान दे देता है। और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी देश में हर 10 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान दे रहा है। आमतौर पर ये देखा गया है कि पढाई और प्यार में असफलता के बाद आत्महत्या ही युवाओं को अंतिम समाधान नजर आता है। इसमें अभिभावकों के पास समय न होने के साथ ही फिल्म और इंटरनेट अहम भूमिका निभा रहे हैं। सुसाइडल टेंडेंसी वाले इंसानों की समय पर पहचान करना और उनकी कांउसलिंग करना बहुत जरूरी है,,,अगर कोई इंसान उदास, गुमसुम, परेशान और खोया-खोया रहे और सबसे अलग रहना चाहे तो समझ लीजिए कि वो नॉरमल नहीं है,,,इसके साथ अगर कोई खुद को हेल्पलेस, निराश, जीवन को बेकार माने या पहले कभी सुसाइड का प्रयास कर चुका हो तो उसे ड्रग्स और एल्कोहल से दुर रखना चाहिए क्योंकि वो भी ऐसे कदम उठा सकता है। सुसाइड करने वाले की मानसिकता बहुत अलग होती है ये कुछ सेकेंडों का दौर होता है अगर किसी तरह उस समय को टाल दिया जाए तो इंसान सुसाइड करने का इरादा बदल सकता है। भारतीय कानून में आत्महत्या एक सामाजिक अपराध है और ऐसा करने से दूसरे लोगों की मानसिकता पर भी इसका असर पड़ता है। सुसाइड करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और जब कभी भी आपके दिमाग में ऐसे ख्याल आएं तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें। हम लोगों को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि बुरे वक्त का हिम्मत के साथ मुकाबला करना चाहिए क्योंकि ये प्रकृति का नियम है कि इंसान के जीवन में बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त जरूर आता है।
 

पायरिया की समस्या


दांतों को सेहत और सुंदरता का आईना माना जाता है। लेकिन, खाने के बाद मुंह की साफ-सफाई न करने से दांतों में कई तरह की बीमारियां शुरू हो जाती हैं। दांतों की साफ-सफाई में कमी के कारण जो बीमारी सबसे जल्दी होती है वो है पायरिया। सांसों की बदबू, मसूड़ों में खून और दूसरी तरह की कई परेशानियां पायरिया के लक्षण हैं। दातों की साफ-सफाई न करने के कारण पायरिया एक सामान्य बीमारी बन गई है। पायरिया के कारण असमय दांत गिर सकते हैं। डिब्बाबंद खाने की चींजे, चॉकलेट्स, आइसक्रीम, शक्कर, मैदा, पालिश वाले चावलों की ओर ज्यों-ज्यों हमारा आकर्षण बढ़ रहा है, त्यों-त्यों इस बिमारी से परेशान लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल मुंह में लगभग 700 किस्म के बैक्टीरिया होते हैं, जिनकी संख्या करोडों में होती है। यही बैक्टीरिया दांतों और मुंह को बीमारियों से बचाते हैं। अगर मुंह, दांत और जीभ की सफाई ठीक से न की जाए तो ये बैक्टीरिया दांतो और मसूडों को नुकसान पहुंचाते हैं। पायरिया होने पर दांतों को सपोर्ट करने वाली जबडे की हड्डियों को नुकसान होता है। पायरिया शरीर में कैल्शियम की कमी होने से मसूड़ों की खराबी और दांत-मुंह की साफ सफाई में कोताही बरतने से होता है। इस बीमारी में मसूड़े पिलपिले और खराब हो जाते हैं और उनसे खून आता है। सांसों की बदबू की वजह भी पायरिया को ही माना जाता है।
 पायरिया की रोकथाम के लिए खाने में खनिज की मात्रा होनी चाहिए जो चोकरयुक्त आटा, दूध, ताजे फल व हरी सब्जियों में अधिक मात्रा में मिलती है। इनका सेवन कर पायरिया से बचाव किया जा सकता है। शरीर के अन्य अंगों की तरह दांतों की रेगुलर एक्सरसाइज बहुत जरूरी है, जो हलुआ-पूरी खाने से नहीं बल्कि कच्ची सब्जियां खाने से और सुबह शाम मुट्ठी भर भीगे हुए गेहूं-चना लेने से हो सकती है। अंकुरित गेहूं में विटामिन "ई" पाया जाता है जो कि पायरिया के अलावा नपुंसकता, बांझपन, जख्म जल्दी न भरना जैसे बिमारियों में बहुत फायदेमंद है। पायरिया का अगर समय पर इलाज न कराया जाए तो दांत ढीले होकर गिर जाते हैं। पायरिया का इलाज बडी आसानी से हो सकता है। पायरिया की समस्या होने पर जल्द से जल्द चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
  

अलीगंज का हनुमान मंदिर



हिन्दुस्तान का दिल उत्तरप्रदेश...  भारतीय संस्कृति का वो जगमगाता दीपक....जिसकी रोशनी की अलग ही प्रभा और प्रभाव है....अनेकता में एकता का वो गुलदस्ता.....जिसे प्रकृति ने अपने हाथों से सजाया है..... जिसका सतरंगी सौंदर्य मनमोहक है.......स्मारक, मंदिर, स्तूप, किले और महल जिसकी पहचान हैं........कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास, जिसकी आवोहबा में हर पल तैरती रहती है... जहां लोक-नृत्य और संगीत की रसधारा सहज रुप से फूटती रहती है..... जिस धरती पर सजती है, संतों की ज्ञान धारा में धर्म की महफिल.... उसी महफिल का एक मुकाम उत्तरप्रदेश का लखनउ शहर भी है..... ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी...शौर्य, साहस के अनंत जीवंत प्रमाणों का गवाह... अनेक संस्कृतियों के संगम का केंद्र....सांस्कृतिक विरासत के साथ ही जिसमें आधुनिकता के रंग भी मिल हुए हैं.. अपने किलों और खूबसूरत मंदिरों के लिए मशहूर लखनउ , आज भी भक्तों के लिए धर्म और आस्था का अहम पड़ाव है.... और इन्हीं अहम पड़ावों में एक है....नया हनुमान मंदिर....रामायण काल में लक्ष्मणजी का राज्य रहा लखनउ में स्थित नया हनुमान मंदिर भारत के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है...आदि काल से ही नया हनुमान जी की महिमा इस जगत में व्याप्त है....लखनउ के अलीगंज इलाके में स्थित नया  हनुमान जी का मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है.....जहां जाति, धर्म और संप्रदाय की सभी सीमाएं टूटती नजर आती है.....सभी धर्म के लोग जहां एक ही माला में गुंथे होते हैं....चाहे राजा हो या रंक, इस दर पर सभी शीश झुकाते हैं....इस दर पर मांगी गई कोई भी दुआ खाली नहीं जाती...यहां आने वाले हर शख्स की मुरादें पुरी होती है....अभिशप्त आत्माएं यहां मुक्ति पाती हैं....लखनउ का नया हनुमान मंदिर काफी चमत्कारी माना जाता है...जिसकी वजह से ये स्थान न केवल उत्तरप्रदेश, बल्कि पूरे देश में विख्यात है.... इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की मूर्ति किसी कलाकार द्वारा निर्मित नहीं बल्कि धरती से गर्भ से प्रकट हुई है। मंदिर को देखते ही मन में शांती और सुकुन की एहसास होने लगता है।  मंदिर में रोज हजारों भक्त भगवान के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आते हैं। इस मंदिर में चौबिंसो घंटे रामायण का पाठ होता रहता है। बजरंगबली के भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव से स्वंय रामायण का पाठ करते हैं। भक्तों की सारी मान्यता हनुमान मंदिर में पहुंचते ही पुरी जाती है और भक्त हर मंगलवार और शनिवार को पुरे परिवार के साथ भगवान के दर्शन को जरूर आते हैं। मंदिर में होने वाली आरती में बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी शामिल होते हैं..भगवान की आरती समय स्रोत का निरंतर पाठ होता रहता है..आरती की दौरान भक्ति के कई रुप देखने को मिलते हैं..कोई हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा होता है, तो कोई ताली बजा कर प्रभु की भक्ति में लीन होता है...तो कई भक्त लगातार मंदिर की घंटियों को बजाते रहते हैं.....आरती खत्म होने के बाद भगवान श्रीराम का आशीर्वाद समझ कर भक्तआरती की लौ अपने चेहरे पर लगाते हैं। श्री खेड़ापति को सच्चे मन चढाया गया कोई भी प्रसाद स्वीकार्य है। परिवार के सुख-शाति की कामना के लिए रोजाना हवन का भी आयोजन किया जाता है...जिसमें हलवा-पूरी से लेकर कई तरह की सामग्रियों की आहुति दी जाती है...जिससे हवन की अग्नि पूरी तरह प्रज्जवलित हो उठती है...जिसकी ज्वाला में सारी उपरी बाधाएं जलकर राख हो जाती है...


अलीगंज में स्थित नया हनुमान मंदिर की बनावट देखने ही यह प्रतीत होता है कि इस मंदिर का निर्माण सैकड़ों साल पहले किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार की बनावट काफी मनमोहक है। जैसे ही मंदिर के मध्य परिसर में भक्त पहुंचते हैं तो वहां उनकों घंटीयों वाली एक लंबी दिवार देखने को मिलता है। जो कि पहली ही दृष्टि में काफी मनमोहक लगती है। इन घंटीयों के बारे में मान्यता है कि इसको बजाने से  प्रभु श्री राम भक्तों की पीड़ा-वेदना समझ कर पवनपुत्र को तत्काल भक्तों के कष्टों के निवारण का आदेश देते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश करने से पहले ही दिखाई देती है....हनुमानजी के आराध्य प्रभु श्रीराम की प्रतिमा...जो मंदिर के ठीक बीचो-बीच प्रतिष्ठित है...धनुर्धारी प्रभु राम की ये आकर्षक प्रतिमा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध करती है और हनुमान जी प्रभु श्रीराम के चरणो में विराजे हुए हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि कभी लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस नगरी से बहती हुई गोमती नदी के उस पार 19वीं शताब्दी में नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी और दिल्ली के मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम द्वारा बसाये गये अलीगंज मोहल्ले में नया हनुमान मंदिर स्थित है। यहा पर हर ज्येष्ठ मास के प्रत्येक मंगलवार को हिन्दुओं और मुसलमानों की ओर से श्रद्धा पूर्वक मनौतियां मानी जाती है और चढावा चढाया जाता है। लखनऊ में मोर्हरम और अलीगंज का महावीर मेला ये ही दो सबसे बड़े मेले होते हैं। मेले में लगभग एक सप्ताह पहले से ही दूर-दूर से आकर हजारों लोग केवल एक लाल लंगोट पहने सड़क पर पेट के बल लेट लेट कर दण्डवती परिक्रमा करते हुए मंदिर जाते हैं। इस मंदिर का इतना महत्व होने से आम तौर पर लोगों के मन में आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है। 14वीं शताब्दी के आरम्भ में बख्तियार खिलजी ने इस हनुमानबाड़ी का नाम बदल कर इस्लामबाड़ी रख दिया, जो आज तक चला आ रहा है। इसके बहुत दिन बाद अवध के त्तकालीन नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया के जब कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई औऱ बहुत से हकीम –वैद्यों की दवाइयों और पीर-फकीर की दुआओं ने भी जवाब दे दिया, तब कुछ लोगों ने उन्हें इस्लामाबाड़ी के बाबा के पास जाकर दुआ मांगने की सलाह दी। कहते हैं कि वे इस्लामाबाड़ी गई औऱ सन्तान की कामना की। उनकी अभिलाषा पूरी हुई। लोंगो का मानना है कि जब वे गर्भवती थीं, तब उन्हें फिर स्वप्न आया, जिसमें उनके पुत्र ने उनसे कहा कि इस्लामाबाड़ी में उसी जगह हनुमान जी का मूर्ति गड़ी है, उसे निकलवाकर किसी मंदिर में  प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। फलत बच्चे के जन्म के बाद रबिया बेगम वहां गयीं औऱ नवाब के सैनिकों ने टीला खोद डाला तथा नीचे से मुर्ति निकाल ली गयी। बाद में उसे साफ सुथरा करके, नवाबी आदेश से सोने चांदी तथा हीरे जवाहरात से सजाकर  हाथी पर रखा गया  ताकि आसफुदौला के बड़े इमामबाड़े के पास ही उसे प्रतिष्ठापित करके मंदिर बनवाया जाय। इस हाथी को लेकर जब सब जा रहे थे तह सड़क के अंतिम छोर पर पहुंचकर उस हाथी ने आगे बढने से इन्कार कर दिया। महावत ने लाख कोशिश की लेकिन हाथी ज्यों का त्यों अड़ा रहा। अन्त में जब उस बाड़ी के साधु ने कहा कि रानी साहिबा हनुमान जी गोमती के उस पार नहीं जाना चाहते, क्योंकि वह लक्ष्मणजी का क्षेत्र है। तब बेगम साहिबा ने वहीं सड़क के किनारे, गोमती तट के निकट मुर्ति स्थापित करा दी औऱ उस साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर बनवा दिया। साथ ही उस साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर का महंत नियुक्त तक दिया गया। मंदिर के लिए उसके आस-पास की अधिकांश जमीन महमूदाबाद रियासत की ओर से मुफ्त में दे दी गयी।

जहां तक नया हनुमान मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ का सवाल है, तो यहां बारहों महीनें भक्तों  का तांता लगा रहता है....देश के सुदूर क्षेत्रों से यहां दर्शानार्थी आते रहते हैं....लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष कार्यक्रम होता है...इस विशेष दिन भक्तों की भारी भीड़ यहां हनुमान जी के दर्शन के लिए आती है...आसपास के लोगों के लिए हनुमान जी का दर्शन उनकी दिनचर्या का ही हिस्सा है.....भक्त और भगवान का ये मिलन वैसे तो आम बात है, लेकिन, इस मिलन के बाद भक्तों के चेहरों पर जो संतोष भाव होता है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है.....देश के मध्य में स्थित होने के कारण किसी भी हिस्से से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है....यहां पहुंचने के लिए सड़क, वायु और रेल मार्ग को अपनी सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है। लखनऊ का मालनपुर एयरपोर्ट, दिल्ली, मुम्बई, कोलकात्ता और चेन्नई जुड़ा है। यहां से टैक्सी और बस के माध्यम से लखनऊ आसानी से पहुंचा जा सकता है और लखनऊ पहुंचने के बाद लोकल सवारियों के अलीगंज के इस प्राचीन मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। रेल मार्ग से लखनऊ पहुंचना बहुत ही सरल है... लखनऊ का दिल्ली, मुम्बई और देश के दूसरे शहरों रेल से सीधा संपर्क है... इसके साथ ही लखनऊ देश के कई शहरों से सड़क मार्ग से भी जुडा हुआ है...अक्टूबर से लेकर मार्च का महीना लखनऊ जाने के लिए सबसे उत्तम है....





फरीदाबाद का शनि मंदिर


भारत में शनिदेव के कई पीठ है किंतु तीन ही प्राचीन और चमत्कारिक पीठ है, जिनका बहुत महत्व है और इन्ही शनिपीठों में जाकर ही पापों की क्षमा माँगी जा सकती है। विद्वानों का मत है कि उक्त स्थान पर जाकर ही लोग शनि के दंड से बच सकते हैं, किसी अन्य स्थान पर नहीं। जीवन में किसी भी तरह की कठिनाई हो या शनि ग्रह का प्रकोप है, लेकिन यहाँ जाकर लोग भय‍मुक्त हो जाते हैं। हिन्दु मान्यता के अनुसार भक्त को तत्काल लाभ मिलता है। कहते हैं कि पिछले कई हजारों वर्षों से यह पीठ आज भी ज्यों के त्यों है और आज भी यहाँ चमत्कार घटित होते रहते हैं। हमारे देश में केवल तीन ऐसे शनि मंदिर है जिसे शनिपीठ के रूप में जाना जाता है और यहीं जाकर हम अपने गुनाहों की माफी शनि देव से मांग सकते हैं। जिनमें से एक महाराष्ट्र के शिंगणापुर में शनि का प्राचिन मंदिर है वहीं दुसरा मंदिर है शनिचरा मंदिर जो कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पास स्थित है। शनि का तीसरा सिद्द पीठ उत्तरप्रदेश के कोशी से छह किलोमीटर दूर कौकिला वन में स्थित है । इसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहाँ शनिदेव के रूप में भगवान कृष्ण विद्‍यमान रहते हैं और जो भी भक्त इस वन की परिक्रमा करके शनिदेव की पूजा करेगा वहीं कृष्ण की कृपा पाएगा। उस पर से शनिदेव का प्रकोप भी हठ जाएगा। शनि के सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र और इंद्रनीलमणि के समान। यह गिद्ध पर सवार रहते हैं। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहते हैं। शनि को सूर्य का पुत्र माना जाता है। उनकी बहन का नाम देवी यमुना और माता का नाम छाया है। हमारे यहां गलत रित है कि शनिदेव की दृष्टि अगर किसी व्यक्ति पर पड़ती है तो उसका हमेशा बुरा ही होता है लेकिन ये मान्यता सरासर गलत है बल्कि श्री शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे न्यायप्रिय ग्रह हैं, जीवों को उनके कर्मो के आधार पर फल देते हैं। यदि उनकी दया-दृष्टि पानी हो तो अपना कर्म सुधारना चाहिए। ऐसा करने से हमारा जीवन अपने आप सुधर जाएगा। शनि जयंती पर सुख और समृद्धि के लिए श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए। श्री शनिदेव को इस दिन किया गया तैलाभिषेक बहुत ही फलदायी होता है। इससे शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होकर शनिभक्तों को सभी बाधाओं से छुटकारा दिलाते हैं। इस दिन जो भी शनिदेव की पवित्र मन से पूजा-पाठ करता है, उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन गरीब, असहाय व जरूरतमंद लोगों की सेवा व सहायता करने वाले लोगों पर भी श्रीशनिदेव की विशेष अनुकंपा होती है। श्री शनिदेव अपने भक्तों में किसी प्रकार का खोट देखना पसंद नहीं करते। यदि भक्त से कोई खोट होता है तो उसे तुरंत दंड देकर उसकी भूल सुधारने का संकेत देते हैं। याद रहे, शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं। उनकी अनुकंपा पानी हो तो अपना कर्म सुधारें, आपका जीवन अपने आप सुधर जायेगा। शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे हमारे कर्मो के आधार पर फल देते हैं। वे जीवों को उनके कर्मफलों का भुगतान करवाते हैं। इतना ही नहीं, श्री शनिदेव मनुष्य को उसके कर्म बंधनों से मुक्त कर उसका जीवन सार्थक करने का रास्ता भी दिखाते हैं। शनिदेव सौरमंडल के प्रमुख ग्रह हैं। हिदुं धर्म में शनि के प्रभावों को देखते हुए इन्हें भाग्य विधाता भी कहा जाता है। जन्म कुंडली के बारह भावों में श्रीशनिदेव की स्थिति भी किए गए कर्मो के अनुरूप ही होती है। यदि व्यक्ति के कर्म खोटे होते हैं तो उनके फल श्रीशनिदेव उनके अनुरूप ही प्रदान करते हैं। इसके लिए उनपर दोष लगाना उचित नहीं।
 - शनि के पिता और माता सूर्यदेव और छाया है।
- शनि के भाई-बहन यमराज, यमुना और भद्रा है। यमराज मृत्युदेव, यमुना नदी को पवित्र व पापनाशिनी और भद्रा क्रूर स्वभाव की होकर विशेष काल और अवसरों पर अशुभ फल देने वाली बताई गई है।
- शनि शिव को अपना गुरु बनाया और तप द्वारा शिव को प्रसन्न कर शक्तिशाली बने।
- शनि का रंग कृष्ण या श्याम वर्ण सरल शब्दों में कहें तो काला माना गया है।
- शनि का जन्म क्षेत्र - सौराष्ट क्षेत्र में शिंगणापुर माना गया है।
- शनि का स्वभाव क्रूर किंतु गंभीर, तपस्वी, महात्यागी बताया गया है।
- शनि, कोणस्थ, पिप्पलाश्रय, सौरि, शनैश्चर, कृष्ण, रोद्रान्तक, मंद, पिंगल, बभ्रु नामों से भी जाने जाते हैं।
- शनि के जिन ग्रहों और देवताओं से मित्रता है, उनमें श्री हनुमान, भैरव, बुध और राहु प्रमुख है।
- ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक कुम्भ और मकर शनि की प्रिय राशियां है।
- शनि को भू-लोक का दण्डाधिकारी व रात का स्वामी भी माना गया है।
- शनि का शुभ प्रभाव अध्यात्म, राजनीति और कानून संबंधी विषयों में दक्ष बनाता है।
- शनि की प्रसन्नता के लिए काले रंग की वस्तुएं जैसे काला कपड़ा, तिल, उड़द, लोहे का दान या चढ़ावा शुभ होता है। वहीं गुड़, खट्टे पदार्थ या तेल भी शनि को प्रसन्न करता है।
- शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि को अनुकूल करने के लिये नीलम रत्न धारण करना प्रभावी माना गया है।
- शनि के बुरे प्रभाव से डायबिटिज, गुर्दा रोग, त्वचा रोग, मानसिक रोग, कैंसर और वात रोग होते हैं। जिनसे राहत का उपाय शनि की वस्तुओं का दान है।
- शनिश्चरी अमावस्या के दिन लोहे के बर्तन में तेल भरकर उसमें 7 दाने काले चने के, 7 दाने जौ के, 7 दाने काली उड़द के तथा सवा रुपया रखकर उसमें अपना मुंह देखकर दान करें या शनि मंदिर में रख दें।
- शनिवार के दिन काले भैंसे या घोड़े को काले चने खिलाएं।
- शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर सात परिक्रमा करें और सात बूंदी के लड्डू काले कुत्ते को खिलाएं।
- योग्य ज्योतिषी से राय लेकर शनि रत्न नीलम गाय के कच्चे दूध व गंगाजल में पवित्र कर धारण करें।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव कश्यप वंश की परंपरा में भगवान सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शनि को काश्यपेय नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि श्री शनिदेव की उत्पत्ति महर्षि कश्यप के काश्यपेय यज्ञ से हुई थी। सूर्य देव की द्वितीय पत्नी छाया के गर्भ से जन्में शनि के श्याम वर्ण को देख कर सूर्य ने अपनी पत्नी पर आरोप लगायें और शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया । तभी से शनि देव अपने पिता सूर्य से शत्रुभाव रखते हैं। इन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या पर अनेक शक्तियां प्राप्त की और नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया । यमराज शनिदेव के भाई और यमुना बहन हैं । भाई दूज पर यमुना स्नान करने वाले भाई बहनों को शनि और यमराज की पीड़ा नहीं सताती । स्वभाव से गम्भीर त्यागी, तपस्वी, हठी, क्रोधी शनिदेव न्यायप्रिय हैं और हनुमान, काल भैरव, बुध और राहू के मित्र हैं तथा कुम्भ और मकर इनकी प्रिय राशि है । शनि देव व्यक्ति के सुख और स्वास्थ्य पर भी अपने ढंग से प्रभाव डालते हैं । पुराणों के अनुसार शनि को परमशक्ति परमपिता परमात्मा ने तीनों लोक का न्यायाधीश नियुक्त किया है। शनिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उनके किए की सजा देते हैं और ब्रह्मांड में स्थित तमाम अन्यों को भी शनि के कोप का शिकार होना पड़ता है। पुराणों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय करता है तो वह शनि की कोप से बच नहीं सकता।  शनि के शुभ प्रभाव से लम्बे समय तक सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हैं, जबकि अशुभ प्रभाव होने पर व्यक्ति को दुख, मानसिक प्रताड़ना, दरिद्रता , भय तथा पेट, आंख , दांत रोगों के साथ ही अंग-भंग जैसे दु:ख झेलने पड़ते हैं। इसके अलावा शराब पीने वाले, माँस खाने वाले, ब्याज लेने वाले, पराई स्त्री के साथ दुराचार करने वाले और ताकत के बल पर किसी के साथ अन्याय करने वाले का शनिदेव 100 जन्मों तक पीछा करते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार शनिदेव मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। यह धरती और शरीर में जहाँ भी तेल और लौह तत्व है उस पर राज करते हैं। शरीर में दाँत, बाल और हड्डियों की मजबूत या कमजोरी का कारण यही हैं। शनिदेव से सभी डरते हैं क्योंकि ज्योतिष के अनुसार शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के फेर में फँसे व्यक्ति की जिंदगी में तूफान खड़े हो जाते हैं। कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी सभी बाधाओं से मुक्ति का यह सबसे उपयुक्त अवसर है। शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना और काली वस्तुओं का दान करना विशेष शुभकारी माना गया है । शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या पर शनि तीर्थ सिद्ध शनिदेव मंदिर पर विशाल मेला का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के लाखों श्रध्दालु आते हैं । शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना करने से शनि देव विशेष फल देते हैं । यदि निश्चल भाव से शनिदेव का नाम ही ले लिया जाये तो व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं, जो व्यक्ति के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का फैसला सुनाते हैं।
उत्तर प्रदेश के कोशी में स्तिथ श्री शनिपीठ मंदिर श्री कृष्ण की जन्मस्थलि मथुरा से 25-30 किलोमीटर दुर है। और मथुरा दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर तथा आगर से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देश भर से शनिभक्त यहां रेल, वायु और सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। कोशी पहुंचने के लिए भक्तों के लिए मथुरा पहुंचना सबसे सरल है और फिर यहां से प्राइवेट और निजि गाडियों से कोशी पहुंचा जा सकता है। रेलमार्ग से आप मथुरा, आगरा और दिल्ली तक आसानी से पहुंचा जा सकता है और यहां पहुंच कर आप सड़क मार्ग से यहां तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा मथुरा रेलवे स्टेशन कोशी के काफी पास में है यहां से आप आटो या टैक्सी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा बस, ऑटो और कई तरह की प्राइवेट टैक्सियां भी चलती हैं दिल्ली, आगरा और मथुरा से शनिमंदिर के लिए चलती हैं। अगर आप वायुमार्ग से यहां पहुंचना चाहते हैं तो दिल्ली और आगरा सबसे नजदीकी एयरपोर्ट हैं और फिर वहां से सड़क मार्ग से कोशी तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

योग से खिलेगा चेहरा



( चेहरा है या चांद खिला )....जी हां.. आप भी चाहती हैं कि आपके पार्टनर आप के चेहरे की तुलना चमकते चांद से करें। लेकिन चांद पर तो दाग हैं। चांद के दाग-धब्बे हटाना तो हमारे बस की बात नहीं मगर चेहरे से दाग-धब्बे मिटाना खुद आप ही के बस की बात है। हमारे त्वचा में कई प्रकार के चर्म रोग या स्किन संबंधी समस्याएं हो जाती हैं। इस तरह की समस्याए अच्छे भले इंसान की खूबसूरती को बिगाड कर रख देती है। इन त्वचा संबंधी समस्याओं या बिमारियों के बारे में सही और वैज्ञानिक जानकारी होना खुद हमारे और हमारे अपनों के लिए बेहद जरूरी होता है। आमतौर पर सफेद दाग, सोरिएसिस या अपरस, मस्से, तिल, सनटैनिंग, और एलर्जी जैसी समस्या अकसर देखने को मिलती हैं। इसके लिए बस आपको हमारे देश की सबसे बड़ी चिकित्सा पद्धति को अपनाना होगा। हमारे देश में सदियों से योग चिकित्सा के जरिए बड़े से बड़े बिमारियो का उपचार संभव हुआ है। योग जीवन जीने की कला है। सुन्दर व्यक्तित्व के लिए सुन्दर चेहरा महत्वपूर्ण मानदंड है। चेहरा मन का दर्पण होता है चेहरे के हाव भाव से ही व्यक्ति की मानसिक स्थिति का पता चलता है । हमारे जनमानस में एक आमधारणा है कि सुन्दर चेहरा पैदा नहीं होता है बल्कि बनाया जाता है। हमारे चेहरे पर 72 मांसपेशियां होती है और ये बहुत जटिल होती है । मासंपेशियों का कनेक्शन शरीर के हर हिस्से तक पहुंचता है। चेहरे को निखारने के लिए रोज चेहरे की कसरत जरूरी है। उम्र बढ़ने के साथ ही व्यक्ति अपनी अनियमित जीवन शैली के चलते अपनी त्वचा की रंगत और चमक को खोता जाता है। रिंकल्स, डार्क सर्कल्स, डल स्किन, आंखों की झुर्रियां, पेट और कमर को योग से बेहतर किया जा सकता है। ऐसे में योग हम सब के लिए एक वरदान की तरह है। योग बिना मूल्य का ऐसा उपचार है जो हर तरह की बिमारियों का ईलाज तो करता ही है, साथ में शरीर को फुर्तिला भी बनाए रखता है और शरीर को सुन्दर, सुडौल और मजबूत भी बनाता है। किसी खास बीमारी के लिए किसी खास योग का उचित समय और उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो निश्चित ही आप निरोग बन सकते हैं।