Wednesday, December 23, 2015

“ ठाकरे परिवार की असंवैधानिक राजनीति ”

भारत एक लोकतांत्रिक देश है लोकतंत्र का मतलब लोगो का लोगो के द्वारा लोगों  के लिए बनाया गया एक तंत्र होता है जिसमें प्रत्येक नागरिक केंद्र और राज्य सरकार बनाने में भागीदारी करता है। भारत का अपना एक संविधान है जिसके अनुसार समाज के प्रत्येक नागरिक को कानूनों का पालन करना पड़ता है। जिससे एक व्यवस्थित और संतुलित समाज की स्थापना होती है और देश की एकता अखण्डता  बनी रहती है।
लेकिन इस सबके बावजूद कुछ लोग अपने हित के लिए भाषावाद और क्षेत्रीयतावाद की राजनीति को जन्म देते है। पिझले कुछ वर्षो से महाराष्ट्र में ऐसे बहुत से उदाहरण देखे गये हैं जिसमें दो दल सर्वोपरी हैं। पहली शिवसेना और दुसरी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) है।
शिव सेना की कमान हाल ठाकरे और उनके पुत्र उद्धव ठाकरे के हाथ में है। दुसरी तरफ मनसे की कमान संभाले हुए है राज ठाकरे जो बाल ठाकरे के ही वंश से सम्बंध रखते है कुछ वर्ष पहले शिवसेना में ही थे लेकिन शिव सेना में अपना भविष्य उज्जवल न दिखने के कारण आपसीमतभेद होने की वजह से शिवसेना का दामन छोड़ दिया । लेकिन शिवसेना के मराठी मुद्दे को राज ने छोड़ा नही बल्कि और मजबुती से पकड़ लिया।
राज ठाकरे के शिवसेना छोड़ने के बाद बाल ठाकरे को एक बड़ा राजनीतिक नुकसान क्षेलना पड़ा क्योेंकि राज ठाकरे शिवसेना में जगह बना चुके थे और काफी संख्या मे लोगों का झुकाव राज ठाकरे की ओर था और समय के साथ बाल ठाकरे से एक अच्छा राजनीतिक अनुभव भी मिल चुका था उसी अनुभव से मनसे बाल ठाकरे की शिवसेना को एक प्रबल प्रतियोगी बनकर चुनौती दे रही है।
महाराष्ट्र में राज ने कई बार यूपी और बिहार के लोगों पर हमले करवाये । उनका मकसद इन लोगों को महाराष्ट्र से बे-दखल करना था । मनसे प्रमुख राज ठाकरे ये नहीं जानते कि भारतीय संविधान के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को भारत राज्य क्षेत्र में अबाध भ्रमण की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 घ), भारत राज्य क्षेत्र में अबाध निवास की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 ड़), और वृत्ति, उपजिवीका या कारोबार की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 छ), के अनुसार देश का प्रत्येक नागरिक सारे देश में कही भी रह सकता है और जीवन यापन कर सकता है।
दुसरी तरफ भतिजे राज ठाकरे को चुनौती देने के लिए बाल छाकरे भी नये  तरीकों से मराठी अस्मिता की बात करते है। कभी सचिन जैसे विश्व भर में ख्याती प्राप्त क्रिकेटर का क्रिकेट तक सीमित रहने की हिदायत दे देते है। सचिन का दोष इतना है कि उन्होने कहा था कि मै एक मराठी हूं और सबसे पहले मैं एक भारतीय हुं। इस विषय पर देश भर में बाल ठाकरे की तीखी आलोचना हुई। इसके बाद तो बाल ठाकरे के मुख्य पत्र सामना के संपादक संजय राउत के भाई ने हद ही कर दी। उन्होंने एक प्राइवेट न्यूज चैनल में शिव सैनिकों के माध्यम से तोड़फोड़ और मारपीट करवाई और संजय राउत ने मीडिया को अपनी औकात में रहने की हिदायत दे दी । जो बाल ठाकरे के खिलाफ बोलेगा उसका यही अंजाम होगा। भला ऐसा भी क्या राजनीतिक गुण्ड़ाराज जो मीडिया के बोलने के अधिकार को खत्म करना चाहता हो। पुत्र उद्धव ठाकरे भी पीछे नही रहना चाहते हैं।
स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया( SBI) भर्ती मामले मे दखलअंदाजी करते हैं तो कभी शिव सैनिकों के माध्यम से बॉलीवुड नायकों को साड़ी भेंट करते हैं।
ऐसा लगता है मराठी वोटों के लिए शिवसेना और मनसे में होड सी लगी हो और राज ठाकरे बाल ठाकरे से कह रहे हों "तु डाल डाल मैं पात पात"
मराठी मुद्दे को लेकर राज ठाकरे बाल ठाकरे से एक कदम आगे ही रहते हैं। पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा में पहुंचे मनसे विधायकों ने सपा विधायक अबु आज़मी के साथ हाथापाई की। कारण अबु आज़मी का मात्र भाषा हिन्दी में शपथ लेना था। भारत में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया है और हिन्दी बोलने पर पाबन्दी, ये एक विचारमीय प्रश्न है।
शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे को लगा की भतीजे राज ठाकरे की लोकप्रियता कुछ ज्यादा बढ़ रही है तो उनसे रहा नही गया और आइपीएल मैचों में कूद पड़े । बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान ने आइपीएल मैचों में पाकिस्तान के किसी भी खिलाडी के न चुने जाने पर दुख प्रकट किया जिसका परिणाम यह हुआ कि शाहरुख को बाल ठाकरे ने आईएसआई का ऐजेन्ट बता दिया और उनकी आने वाली फिल्म 'माई नेम इज खान' की महाराष्ट्र में रिलीज टाल दी। जिससे शिवसेना के सामने महाराष्ट्र सरकार कमजोर लगने लगी । लेकिन काफी खींचा-तानी के बाद कड़ी सुरक्षा के बीच फिल्म को रिलीज किया गया। खैर जो भी हो लेकिन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को दो बडे झटके लगे। पहला कांग्रेस महासिव राहुल गांधी का सफल मुम्बई दौरा और शाहरुख खान की फिल्म 'माई नेम इज खान' का रिलीज होना। फिल्म रिलीज के मुद्दे पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने पहले ही साफ कर दिया कि वह फिल्म रिलीज का कोइ विरोध नही करेगें और न ही उन्हें फिल्म से कोइ आपत्ती है। इससे एक बात साफ है कि राजनीति में न ही कोइ स्थाई दोस्त होता है और न कोइ स्थाई दुश्मन।


हमारा देश जाति – धर्म की राजनीति में ही खोखला हो गया है। अब भाषावाद और क्षेत्रवाद की राजनीति उसे और खोखला किये जा रही है। अगर ठाकरे परिवार की क्षेत्रियतावाद और भाषावाद की राजनीति जो कि असंवैधानिक राजनीति है पर रोक न लगाई । तो इस प्रकार की राजनीति भारत के अन्य राज्यों में भी पनप सकती है जिसके परिणाम अत्यधिक भयभीत करने वाले होगें। देश की औद्योगिक राजधानी मुम्बई जिसे सारा देश आमची मुम्बई कहता है वह आमची मुम्बई न रहकर मराठी या ठाकरे परिवार की मुम्बई मात्र रह जायेगी।

भारत में हिंदी सिनेमा

भारतीय जनमानस में सिनेमा
मूक सिनेमा में ही बाबूराव पेंटर जैसे फिल्मकार उभर चुके थे, जिनके लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं था बल्कि वह सामाजिक संदेश देने का माध्यम भी था। 1930 और 1940 के दशक में मराठी और हिंदुस्तानी फिल्मों को ऊंचाइयों की ओर ले जाने वाले एस. फत्तेलाल, विष्णुपंत दामले और वी. शांताराम इन्हीं बाबूराव पेंटर की देन थे। भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद की शुरुआत का श्रेय बाबूराव पेंटर को जाता है।
इसके बावजूद यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीय सिनेमा ने यथार्थवाद को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का आधार बनाया था। इसके विपरीत सिनेमा ने अपना संबंध 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उभरे लोकप्रिय रंगमंच पारसी थियेटर से जोड़ा। लोकप्रिय रंगमंच की यह परंपरा पश्चिम की प्रोसेनियम परंपरा और भारतीय लोक रंग परंपरा का मिश्रण था। रंगमंच और रंगशाला की बनावट काफी हद तक पश्चिम के अनुकरण पर आधारित होती थी लेकिन जो नाटक खेले गए और नाटकों को जिस तरह मंच पर पेश किया गया, उस पर भारतीय लोक परंपरा का प्रभाव ज्यादा था। पौराणिक, ऐतिहासिक, रहस्य-रोमांच और जादुई चमत्कारों से भरपूर काल्पनिक कथाओं को पेश करने के साथ-साथ उनमें नृत्य, गीत और संगीत का समावेश किया जाना भारतीय लोक परंपरा के अनुरूप था।
पारसी थियेटर की भूमिका
पारसी थियेटर ने आमतौर पर ऐसे ही नाटक खेले जो जनता के व्यापक हिस्से के बीच लोकप्रिय हो सकते थे, समाज के किसी भी हिस्से की भावनाओं को आहत किये बिना उनका मनोरंजन कर सकते थे। लेकिन वे यह सावधानी जरूर रखते थे कि उन्हें अपने नाटकों के कारण तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक कोपभाजन का शिकार न होना पड़े। इसने काफी हद तक नाटकों की अंतर्वस्तु को सीमित कर दिया। धार्मिक, पौराणिक और काल्पनिक कथाओं की भरमार जो पारसी थियेटर में दिखाई देती है उसके पीछे यह सोच ही काम कर रही थी। इसके बावजूद यह कहना उचित नहीं है कि पारसी थियेटर ने किसी तरह की सकारात्मक भूमिका नहीं निभायी। इसके विपरीत पारसी थियेटर ने धार्मिक और पौराणिक कथानकों को पेश करते हुए भी धार्मिक संकीर्णता या धार्मिक विद्वेष की भावनाओं से बचने की कोशिश की। उनके नाटकों से उदार और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण ही व्यक्त हुआ। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बढ़ावा दिया। आगा हश्र कश्मीरी (1879-1935) का नाटक ‘यहूदी’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, जिस पर कई बार फिल्में बनीं और बिमल राय ने भी इस नाटक पर फिल्म बनाना जरूरी समझा।
पारसी थियेटर ने हिंदी-उर्दू विवाद से परे रहते हुए बोलचाल की एक ऐसी भाषा की परंपरा स्थापित की जो हिंदी और उर्दू की संकीर्णताओं से परे थी और जिसे बाद में हिंदुस्तानी के नाम से जाना गया। यह भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में संपर्क भाषा के रूप में विकसित हुई थी। हिंदी सिनेमा ने आरंभ से ही भाषा के इसी रूप को अपनाया। इस भाषा ने ही हिंदी सिनेमा को गैर हिंदी भाषी दर्शकों के बीच भी लोकप्रिय बनाया। यह द्रष्टव्य है कि भाषा का यह आदर्श उस दौर में न हिंदी वालों ने अपनाया और न ही उर्दू वालों ने। साहित्य की दुनिया में इसे प्रेमचंद ने ही न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि इस भाषा का रचनात्मक और कलात्मक परिष्कार भी किया। बाद में साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन ने भाषा के इस आदर्श को अपना वैचारिक समर्थन भी दिया और उसका विकास भी किया। लेकिन यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि हिंदी-उर्दू सिनेमा का भाषायी आदर्श इसी पारसी थियेटर की परंपरा का विस्तार था और इसी वजह से जिसे आज हिंदी सिनेमा के नाम से जाना जाता है उसे दरअसल हिंदुस्तानी सिनेमा ही कहा जाना चाहिए।
1912-13 से भारत की विभिन्न भाषाओं में कथा फिल्मों का जो निर्माण शुरू हुआ, इन सौ सालों में एक बहुत बड़ा उद्योग बन चुका है। प्रत्येक वर्ष भारत में पचीस से अधिक भाषाओं में औसतन 1100 से अधिक फिल्मों का निर्माण होता है। यह संख्या हॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों से लगभग 40 प्रतिशत ज्यादा है। फिल्म उद्योग में प्रति वर्ष बीस हजार करोड़ का व्यवसाय होता है। लगभग 20 लाख लोगों का रोजगार इस उद्योग पर निर्भर है। हिंदी फिल्में कुल बनने वाली फिल्मों के एक तिहाई से अधिक नहीं होती लेकिन व्यवसाय में उनकी भागीदारी लगभग दो तिहाई है। वैसे तो भारतीय (विशेषत: हिंदी) फिल्में चौथे-पांचवे दशक से ही भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी देखी जाती थीं, खासतौर पर अफ्रीका के उन देशों में जहां भारतीय बड़ी संख्या में काम के सिलसिले में जाकर बस गए थे। लेकिन पिछले दो दशकों में भारतीय फिल्मों ने अमेरिका, यूरोप और एशिया के दूसरे क्षेत्रों में भी अपना बाजार का विस्तार किया है। यह भी गौरतलब है कि भारत में अब भी हॉलीवुड की फिल्मों की हिस्सेदारी चार प्रतिशत ही है जबकि यूरोप, जापान और दक्षिण अमरीकी देशों में यह हिस्सा कम-से-कम चालीस प्रतिशत है। भारत की कथा फिल्मों ने कहानी कहने की जो शैली विकसित की और जिसे प्राय: बाजारू, अरचनात्मक और अकलात्मक कहकर तिरस्कृत किया जाता रहा उसी ने भारतीय फिल्मों को हॉलीवुड के वर्चस्व में जाने से बचाये रखा।
बदलाव की शुरूआत
कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर मूक फिल्मों को देखने से यह स्पष्ट नहीं होता था कि भारत में देश की आजादी का संघर्ष चल रहा है। फिल्म माध्यम की शक्ति को तो रवींद्रनाथ, प्रेमचंद आदि आरंभ में ही पहचान गए थे, इसके बावजूद यह मुमकिन नहीं हो पा रहा था कि साहित्य की तरह सिनेमा के द्वारा भी लोगों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक बनाया जा सकता है। लेकिन सवाक फिल्मों की शुरुआत के साथ बदलाव के संकेत दिखने लगे थे। फिल्मों में जो नयी पीढ़ी आ रही थी, वह सामाजिक और राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक थी। 1930 के दशक में वी. शांताराम, एस. फत्तेलाल, वी. दामले, बाबूराव पेंढेरकर, नितिन बोस, देवकी बोस, पी.सी.बरुआ, ज्योतिप्रसाद अगरवाला, अमिय चक्रवर्ती, धीरेंद्र नाथ गांगुली, सोहराब मोदी, हिमांशु राय, ज्ञान मुखर्जी, अमिय चक्रवर्ती, गजानन जागीरदार, पृथ्वीराज कपूर, महबूब खान, ख्वाजा अहमद अब्बास, बी.एन. रेड्डी, एच. एम. रेड्डी, केदार शर्मा, जिया सरहदी, के. सुब्रह्मण्यम, आदि कई फिल्मकार उभर कर आये। 1930 तक आते-आते आजादी का संघर्ष जनता के व्यापक हिस्सों तक पहुंच गया था। गांधी-नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस व्यापक जन आंदोलनों की तरफ बढ़ रही थी, तो दूसरी तरफ रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि सैंकड़ों युवा देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारी मार्ग अपना रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी और प्रतिबंध के बावजूद उसका प्रभाव क्षेत्र बढ़ रहा था। अब आजादी का आंदोलन सिर्फ मध्यवर्ग तक सीमित नहीं था। किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, विद्यार्थियों और युवाओं की समस्याएं भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही थीं। ऐसे में यह मुमकिन नहीं था कि फिल्मों पर इसका असर न हो।
औपनिवेशिक राजसत्ता की अधीनता और सेंसर बोर्ड के नियंत्रण के कारण फिल्मकार खुलकर राजनीतिक जागरूकता वाली फिल्में नहीं बना सकते थे। इसलिए उन्होंने अपनी राष्ट्रीय और जनोन्मुखी भावनाओं को सांकेतिक रूप में व्यक्त करने की कोशिश की। सवाक फिल्मों के इस आरंभिक दौर की फिल्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी उन फिल्मों की है जिनमें किसी मध्ययुगीन संत या शासक के जीवन को पेश किया गया था। दूसरी श्रेणी उन फिल्मों की है जो किसी-न-किसी सामाजिक समस्या से प्रेरित थीं। इन दोनों तरह की फिल्मों का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं था। इनके अलावा अधिकतर फिल्में वे थीं जो मनोरंजन के लिए बनायी गई थीं और पैसा बनाना ही जिनका मकसद था। पहली श्रेणी की फिल्मों का मकसद भारत के मध्ययुग की गौरवपूर्ण तस्वीर पेश करना था। अंग्रेजी राजसत्ता के अंतर्गत औपनिवेशिक इतिहासकारों ने भारतीय मध्ययुग का इतिहास जिस रूप में निर्मित किया था, ये फिल्में उससे भिन्न ढंग का इतिहास रच रही थीं। राष्ट्रवादी प्रभाव इन पर भी था, लेकिन वे मध्ययुग को अंधकार युग के रूप में पेश नहीं कर रहे थे जैसाकि औपनिवेशिक इतिहासकार कर रहे थे। इस दौर के शासकों पर बनी फिल्मों का मकसद उनकी वीरता और अपराजेयता का गुणगान करना नहीं वरन समानता और सहिष्णुता की भावना पर आधारित एक न्यायकारी व्यवस्था पर बल देना था। महत्त्वपूर्ण यह है कि हुमायूं, अकबर, शाहजहां आदि मुगल शासकों को वे विदेशी शासकों के रूप में नहीं वरन भारतीय शासकों के रूप में ही पेश कर रहे थे। चंडीदास, विद्यापति, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, मीरा, संत पोतना आदि पर बनी फिल्मों का मकसद धर्म का प्रचार करना नहीं था बल्कि धार्मिक कट्टरता और रूढि़वाद के विरुद्ध धार्मिक सहिष्णुता, जाति और धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर मानवीय एकता और भाईचारे की भावना पर बल देना था। निश्चय ही 1930 से पहले की पौराणिक फिल्मों से भिन्न यह महत्त्वपूर्ण बदलाव था और इस दृष्टि से यह प्रगतिशील कदम भी था।
सामाजिक समस्याओं की अभिव्यक्ति
इस दौर में सामाजिक समस्याओं पर भी कई फिल्में बनीं, जिनका मूक सिनेमा के दौर में लगभग अभाव था। अछूत समस्या, विधवा विवाह, अनमेल विवाह, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति आदि समस्याओं पर साहसपूर्ण फिल्में बनायी गईं। किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों आदि के जीवन की समस्याओं को भी फिल्मों का विषय बनाया। पहली बार साहित्य की कई रचनाओं का फिल्मांतरण किया गया। रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रेमचंद आदि लेखकों की रचनाओं पर फिल्में बनीं। प्रेमचंद के उपन्यास पर 1938 में तमिल में सेवासदन के नाम से फिल्म बनायी गई। हिंदी और उर्दू के कई लेखक फिल्मों से जुड़े। यह भी उल्लेखनीय है कि मराठी और बांग्ला में बनने वाली बहुत सी फिल्में साथ ही साथ हिंदी में भी बनती थीं। यहां तक कि 1945 में तमिल में बनी मीरा फिल्म को साथ ही साथ हिंदी में भी बनाया गया था। इसी दौर में कई ऐसे फिल्मकार भी सामने आये जिन्होंने सामाजिक समस्याओं पर फिल्म बनाना ही अपना लक्ष्य बनाया। 1930 के दशक में होने वाले इन परिवर्तनों ने ही कई गंभीर लेखकों को फिल्मों के लिए लिखने को प्रेरित किया। हिंदी-उर्दू के महान लेखक प्रेमचंद 1934 में इस आशा से मुंबई पहुंचे थे कि वे स्वतंत्र लेखन और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन द्वारा जिन आर्थिक दुश्वारियों में फंसे रहते हैं, उन्हें उससे कुछ हद तक मुक्ति मिलेगी। उन्होंने मुंबई में रहकर मोहन भवनानी की फिल्म मजदूर की पटकथा लिखी। लेकिन फिल्मों का यह अनुभव प्रेमचंद को ज्यादा रास नहीं आया। प्रेमचंद ने थोड़े समय में ही फिल्मी दुनिया की बुनियादी कमजोरियों को पहचान लिया था। बलराज साहनी सहित कई अन्य लेखकों का अनुभव भी फिल्मी दुनिया के बारे में इससे कुछ अलग नहीं था। प्रेमचंद के इन कटु अनुभवों के बावजूद फिल्मों से साहित्यकारों के जुडऩे का सिलसिला लगातार चलता रहा। जिस वजह से प्रेमचंद फिल्मों से जुड़े थे, वह वजह लेखकों को फिल्मों की तरफ आकृष्ट करती रही लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं था। इस माध्यम में निहित रचनात्मक संभावना और व्यापक समुदाय तक पहुंचने की क्षमता ने भी लेखकों को इसकी ओर खींचा। दृश्य माध्यम होने के कारण सिनेमा उन लोगों तक भी पहुंच सकता था जो पढऩा-लिखना नहीं जानते थे। लेकिन इस माध्यम के साथ कठिनाई यह थी कि इसका निर्माण और प्रदर्शन साहित्य लेखन और उसके प्रकाशन की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा था। यहां तक कि नाटकों की तुलना में भी यह बहुत महंगा था। फिल्म बनाने के लिए जितने निवेश की जरूरत थी, उसका प्रबंध करना आसान नहीं था।ऐसी स्थिति में यह बहुत जरूरी था कि फिल्मकार मनोरंजक फिल्म के जरिए ही उन संदेशों को अभिव्यक्त करने का रास्ता भी ढूंढे जिन्हें साहित्य अपने ढंग से अभिव्यक्त कर रहा था।
वामपंथ का उदय और इप्टा का योगदान
1930 के बाद के दौर में राजनीति में ही नहीं साहित्य में भी परिवर्तन हो रहा था। समाज सुधार और देशभक्ति की जिन भावनाओं को साहित्य अभिव्यक्ति दे रहा था, उसे वामपंथ के उदय ने एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। अब तक मुक्ति की इच्छा बहुत कुछ अमूर्त रूप में ही व्यक्त हो रही थी। राजनीतिक मुक्ति के बाद का भारत कैसा होगा, यह अभी न राजनीति का और न साहित्य रचना का ठोस मुद्दा बना था। लेकिन जनता की बढ़ती भागीदारी के साथ ये प्रश्न भी आकार लेने लगे थे और साहित्य में भी इन्हें विषय बनाया जाने लगा था। 1917 की बोल्शेविक क्रांति और उसके बाद की विश्व घटनाओं का असर भारत पर भी पडऩा स्वाभाविक था। क्रांति के बाद सोवियत संघ जिस तरह के बदलाव के दौर से गुजर रहा था, उसकी ओर भी भारत जैसे देश उत्सुकता से देख रहे थे। भारतीय लेखकों के वामपंथ की ओर बढ़ते झुकाव ने ही 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी। प्रगतिशील लेखक संघ लेखकों का एक ऐसा व्यापक संगठन था जिसमें उन सब लेखकों के लिए गुंजाइश थी जो स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास करते थे और जो किसी भी तरह के शोषण और उत्पीडऩ का विरोध करना अपना कर्तव्य समझते थे।यह संगठन किसी भाषा विशेष या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं था। भारत की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं के लेखक इससे जुड़े थे। अगले कुछ सालों में देश के हर हिस्से में लेखक संगठन की गतिविधियों का विस्तार हुआ। यह विस्तार सिर्फ लेखकों तक सीमित नहीं था बल्कि संस्कृति के अन्य क्षेत्रों में भी इसका असर देखा जा सकता था। संगठन के इसी विस्तार ने नाटकों के मंचन के लिए एक सहयोगी संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। 1943 में मुंबई में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की स्थापना की गई। इप्टा की गतिविधियों का भी विस्तार हुआ और कई लेखक और रंगकर्मी इप्टा की गतिविधियों से जुड़ते चले गए थे। इन गतिविधियों के विस्तार के साथ ही इप्टा के संस्कृतिकर्मियों ने महसूस किया कि इप्टा को फिल्म निर्माण की ओर भी गतिशील होना चाहिए।
इप्टा के साथ बहुत गहरे रूप से जुड़े उर्दू के कथाकार ख्वाजा अहमद अब्बास 1940-41 से फिल्मों से भी जुड़े थे। वे पहले से ही पत्रकार के रूप में फिल्मों की समीक्षा लिखते रहे थे और उन्होंने 1941 में बांबे टॉकीज की फिल्म नया संसार के लिए ज्ञान मुखर्जी के साथ मिलकर पटकथा लिखी थी। इसी तरह उर्दू के प्रख्यात कथाकार सआदत हसन मंटो ने 1937 में किसान कन्या फिल्म की पटकथा और संवाद लिखे थे। पृथ्वीराज कपूर जो 1929 से फिल्मों में अभिनय कर रहे थे और जिन्होंने पहली सवाक फिल्म आलमआरा में भी काम किया था, अपनी लोकप्रियता के शिखर पर रहते हुए 1944 में पृथ्वी थियेटर्स के नाम से नाटकों के मंचन की संस्था बनायी। पृथ्वी थियेटर्स के साथ इप्टा के भी कलाकार जुड़े थे। उन्होंने पठान, किसान, गद्दार, दीवार आदि कई नाटक खेले जो काफी प्रसिद्ध हुए इस तरह के कई संगठन देश के और क्षेत्रों में भी काम कर रहे थे।
1946_Dharti-ke-lalइप्टा के अपने प्रयत्नों से 1946 में धरती के लाल फिल्म का निर्माण हुआ। इसी साल इप्टा से जुड़े चेतन आनंद ने इप्टा के सहयोग से ही नीचा नगर फिल्म बनायी। यह फिल्म उसी साल केन्स फिल्म समारोह में दिखाई गई और उसे दो अन्य फिल्मों के साथ सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ। विश्व के किसी भी समारोह में पुरस्कृत होने वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी। इसके अतिरिक्त इसी साल प्रदर्शित होने वाली वी. शांताराम की फिल्म डॉ. कोटनीस की अमर कहानी में भी इप्टा से जुड़े कलाकारों का सहयोग था। हिंदी सिनेमा की प्रगतिशील और यथार्थवादी धारा से इन फिल्मों का बहुत गहरा संबंध है। इन फिल्मों से पहले भी कई फिल्में किसानों और मजदूरों की समस्याओं पर और समाज में व्याप्त वर्ग विभाजन पर बन चुकी थीं। लेकिन स्पष्ट राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के साथ बनने वाली पहली फिल्में धरती के लाल और नीचा नगर ही थीं। इस दृष्टि से इन दोनों फिल्मों का ऐतिहासिक महत्त्व है। दोनों फिल्मों पर पश्चिम के यथार्थवाद का असर साफतौर पर देखा जा सकता है। लेकिन ये फिल्में उनका अनुकरण नहीं हैं। इसके विपरीत भारत की लोकनाट्य परंपरा के अनुरूप इनमें नृत्य और गीतों का सहारा भी लिया गया है। कुछ हद तक फिल्मों की मेलोड्रामाई शैली को इन फिल्मकारों ने भी अपनाया।
बदले हुए दौर में प्रगतिशील
आजादी के बाद की बदली परिस्थितियों ने फिल्म क्षेत्र में इप्टा की संगठित भूमिका को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। लेकिन इस दौरान जो लेखक और कलाकार प्रलेस और इप्टा से जुड़े थे, उनमें से कइयों ने सिनेमा को आजीविका का ऐसा क्षेत्र मानकर अपनाना शुरू कर दिया जहां कुछ हद तक उनकी रचनात्मक जरूरतें भी पूरी होने की उम्मीद थी। इप्टा से जुड़े ऐसे लेखकों और कलाकारों की लंबी सूची है जिन्होंने फिल्मों से अपने को जोड़ लिया। प्रगतिशील सोच के लेखकों और कलाकारों के फिल्मों में जाने ने फिल्मों पर क्या असर डाला इसका विवेचन होना बाकी है। क्या ये लोग फिल्मों के व्यावसायिक रंग में पूरी तरह डूब गए और प्रगतिशीलता की उस परंपरा से पूरी तरह नाता तोड़ लिया था जिसने उनके अंदर के लेखक और कलाकार का निर्माण किया था और उसे संवारा था, या इन्होंने अपनी वैचारिक, रचनात्मक और कलात्मक परंपराओं से फिल्मों को भी प्रभावित किया। 1950-60 का दौर जिसे भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है, क्या यह इन प्रगतिशील लेखकों और कलाकारों की भागीदारी के बिना मुमकिन हो पाता? इस दौर की हिंदी, बांग्ला, मराठी, असमिया, तमिल, मलयालम आदि भाषाओं की उल्लेखनीय फिल्मों से ही यह जाना जा सकता है कि इप्टा के कलाकारों ने सिनेमा को किस हद तक प्रभावित किया होगा। इन फिल्मों से इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लेखकों और कलाकारों ने काम किया था। इस पूरे दौर में वी. शांताराम, मेहबूब खान, ख्वाजा अहमद अब्बास, बिमल रॉय, राजकपूर, गुरुदत्त, के. बालांचदर, ऋषिकेश मुखर्जी, जिया सरहदी, मोहन सहगल, रमेश सहगल, चेतन आनंद, कमाल अमरोही, आदि कई फिल्मकारों ने सामाजिक दृष्टि से सोद्देश्यपूर्ण और कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट फिल्मों का निर्माण किया। इस दौर के फिल्मकारों ने इस बात का ध्यान रखा कि फिल्मों द्वारा जो संदेश वे दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं, उन्हें लोकप्रिय ढंग से पहुंचाया जाए। इसके लिए उन्होंने यथार्थवाद और पहले से चली आ रही मेलोड्रामाई शैली का संयोजन किया। उन्होंने फिल्म की भाषा, गीत, संगीत और संवादों पर भी खास ध्यान दिया। इसके लिए उन्होंने शास्त्रीय और लोक परंपराओं का मिश्रण किया। इस बात का ध्यान रखा कि भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहु भाषायी देश है इसलिए उन्होंने भारत की विभिन्न जातीय और सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी फिल्मों में समाहित करने का प्रयास किया। यह अवश्य है कि साठ के दशक के बाद सिनेमा की यह परंपरा कमजोर होने लगी और व्यावसायिकता और सतही लोकप्रियता फिल्मों पर हावी होने लगी। इसी ने संभवत: नए फिल्मकारों को प्रेरित किया होगा कि वे पूरी तरह से सिनेमा की लोकप्रिय शैली का त्याग करें और एक नया मार्ग अपनाएं। यह और बात है कि नब्बे के दशक तक आते-आते न्यू वेव सिनेमा की यह परंपरा भी कई बाहरी और अंदरूनी कारणों से लुप्त हो गई। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोकप्रियता और कलात्मकता की बहसों में पड़े बिना सामाजिक सोद्देश्यता से परिपूर्ण कलात्मक और साथ ही लोकरंजनकारी फिल्म बनाने की परंपरा आज भी पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है।
सिनेमा एक लोकप्रिय माध्यम है। इसमें सब तरह के फिल्मकार सक्रिय हैं। सिनेमा को साहित्य की तरह कला मानने वाले फिल्मकार भी हैं, तो ऐसे फिल्मकार भी हैं जिनके लिए यह महज पैसा बनाने और अमीर बनने का जरिया है। ऐसे लोगों के लिए फिल्म न तो एक कला माध्यम है और न ही वे यह मानते हैं कि मनोरंजन के अलावा भी सिनेमा का कोई सामाजिक उद्देश्य हो सकता है। सिनेमा यदि कला है और यदि उसका कोई सामाजिक उद्देश्य है तो यह मुमकिन नहीं है कि फिल्मकार उसके रचनात्मक और कलात्मक पहलुओं पर विचार न करे। साहित्य की तरह सिनेमा भी अपनी प्राणशक्ति समाज से ही प्राप्त करता है। लोकप्रिय सिनेमा शुरू से ही मूलगामी सिनेमा नहीं रहा। लेकिन इसने लोकप्रियता के ढांचे में रहते हुए ही उन जरूरी कार्यभारों को अंजाम देने की कोशिश की जिससे कि धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में देश को बनाये रखने में मदद मिले। भारतीय गणतंत्र की स्थापना के समय जो फिल्मकार सक्रिय थे उन्होंने अपने-अपने ढंग से न सिर्फ उस समय के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाया है बल्कि उस भविष्य की भी चिंता की है जो इस वर्तमान से ही बनेगा। इसलिए वे अपनी फिल्मों को ऐसे भारत के निर्माण में हिस्सेदार बनाना चाहते थे जो काफी हद तक उन्हीं आदर्शों और मूल्यों पर टिका था जिनका उल्लेख भारतीय संविधान में किया गया था और जिसका स्वरूप आजादी की लड़ाई के दौरान बना था। इन्होंने कोई क्रांतिकारी एजेंडा हाथ में नहीं लिया था लेकिन इन फिल्मकारों को यह महसूस हो रहा था कि समतावादी भारत के बनने में भी कई मुश्किलें हैं जिनको दूर करना जरूरी है। इनमें गरीबी, भुखमरी, औरतों की आजादी, दलितों का उत्पीडऩ, मुनाफाखोरी और लोभ-लालच के लिए गैरकानूनी कामों में लिप्त रहना और धार्मिक और सांप्रदायिक वैमनस्य आदि का उल्लेख किया जा सकता है। भारतीय सिनेमा ने आजादी के बाद के दो दशकों तक इन सभी सवालों को अपने खास अंदाज में उठाया है। वे किसी एक समस्या को केंद्र में रखते हुए दूसरे मसलों को भी मूल कथा से इस तरह जोड़ देते हैं कि वे उनसे अलग और पैबंद की तरह नजर न आए। यहां तक कि इनमें से कुछ ने फिल्म रूढि़ का रूप ले लिया था। मसलन हिंदू और मुसलमान या अन्य किसी धार्मिक अल्पसंख्यक की आत्मीय मित्रता। फिल्म की कथा कोई भी क्यों न हो इसमें धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव को जरूर शामिल किया जाता था। यथार्थवाद और मेलोड्रामाई शैली के कलात्मक संयोजन की यह परंपरा 1960 के बाद कमजोर हुई।
नई लहर
1960 के दशक तक सिनेमा में व्यावसायिकता और अव्यवसायिकता या कलात्मकता और अकलात्मकता जैसा भेद नहीं था। इस भेद की शुरुआत खासतौर पर उस न्यूवेव सिनेमा से हुई जिसने सजग रूप से फिल्मों की लोकप्रिय परंपरा से अपने को अलगाने की कोशिश की। सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन ने छठे दशक में और बाद में अदूर गोपालकृष्णन, जी. अरविंदन, एम. एस. सथ्यु, श्याम बेनेगल, कुमार शहानी, मणि कौल, सईद अख्तर मिर्जा, गिरीश कासरवल्ली आदि फिल्मकारों ने सचेत रूप से फिल्मों में यथार्थवाद और नवयथार्थवाद की उन परंपराओं को अपनाया जो यूरोप में पांचवें और छठे दशक में प्रतिष्ठित हुई थी। हॉलीवुड की अतिरंजनकारी शैली को इन फिल्मकारों ने भी नहीं अपनाया। इस शैली का असर सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में बनाने वाले फिल्मकारों पर ही अधिक दिखा जिन्होंने मेलोड्रामाई शैली को हॉलीवुडीय शैली के साथ मिलाकर अपराध प्रधान फिल्मों का निर्माण किया था। इनमें से अधिकतर फिल्में फिल्म इतिहास के कूड़ेदान में पहुंच चुकी हैं।
अपनी व्यापक पहुंच ने सिनेमा को भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक परंपरा वाले देश के लोगों के लोकरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम बना दिया है। जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है भारत में पचीस से अधिक भाषाओं में फिल्में बनती हैं जिनमें एक चौथाई फिल्में हिंदी की होती है जिनके दर्शक सिर्फ हिंदी-उर्दूू क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। यहां यह प्रश्न जरूर उठता है कि क्या बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी आदि की तरह हिंदी सिनेमा भी क्षेत्रीय सिनेमा है? जब भी हिंदी सिनेमा की बात की जाती है तो हमारे सामने वह सिनेमा आता है जिसमें पात्रों की बातचीत हिंदी में होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि बात करने वाले पात्र भी हिंदी भाषी भी हों। यह भी जरूरी नहीं कि कहानी का संबंध हिंदी भाषी क्षेत्र से हो और यह भी जरूरी नहीं कि उस फिल्म का निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक, अभिनेता-अभिनेत्री, संगीतकार आदि भी हिंदी भाषी हों। अगर हम किसी भी दौर की महत्त्वपूर्ण हिंदी फिल्मों के बारे में विचार करें चाहे वे लोकप्रिय सिनेमा के अंतर्गत आती हों या कलात्मक सिनेमा के अंतर्गत उनमें से अधिकतर के फिल्मकार हिंदी भाषी नहीं हैं। यह भी चौंकाने वाला तथ्य है कि ज्यादातर हिंदी भाषी क्षेत्र के फिल्मकार उर्दू पृष्ठभूमि से आये हुए हैं। यदि किसी एक क्षेत्र में हिंदी-उर्दू भाषियों का बाहुल्य है तो वह है संवाद और गीत लेखन में। यहां भी ज्यादातर लेखक उर्दू परंपरा से आये हुए हैं हिंदी परंपरा से कम। यह भी गौरतलब है कि हिंदी के वे ही लेखक फिल्मों में कामयाब हुए जिन्होंने फिल्मों की भाषायी परंपरा को अपनाकर ही अपनी पहचान बनायी। नरेंद्र शर्मा, शैलेंद्र, सरस्वती कुमार दीपक, प्रदीप, नीरज, राही मासूम रजा, कमलेश्वर आदि फिल्मों में सफल रहे तो इसी वजह से।
सिनेमा की भाषा
इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि हिंदी सिनेमा की भाषा उर्दू के निकट है। इसके विपरीत यह उस बोलचाल की भाषा के निकट है जिसे आसानी से हिंदी या उर्दू कहा जा सकता है और जिसे ही हिंदुस्तानी जबान नाम भी दिया गया। यही नहीं इसने न सिर्फ हिंदी क्षेत्र की विभिन्न बोलियों के शब्दों को जरूरत के अनुसार अपनाया बल्कि अन्य भाषायी क्षेत्रों के शब्दों को अपनाने में भी कोई कोताही नहीं की। कहानी और पात्रों की जरूरत के अनुसार सिनेमाई भाषा अपने को ढालती रही है। श्याम बेनेगल की फिल्में इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं जिनकी फिल्में प्राय: भारत के अलग-अलग प्रांतों के जीवन यथार्थ से संबंधित होती हैं। उनकी फिल्मों की भाषा और पात्रों का हिंदी बोलने का ढंग भी उसी के अनुरूप बदल जाता है।
हिंदी फिल्मों ने अपने को क्षेत्रीय और भाषायी संकीर्णता से दूर रखा। उन्होंने फिल्मों की कहानी को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया कि वे किसी एक क्षेत्र तक सीमित न दिखाई दें और यदि वे किसी क्षेत्र विशेष से संबद्ध दिखाई भी दें तो उसकी अपील अवश्य सार्वभौमिक हो। प्रसिद्ध फिल्मकार महबूब की अत्यंत लोकप्रिय फिल्म मदर इंडिया का उदाहरण लिया जा सकता है जो गुजराती पृष्ठभूमि में बनी है जिसे पात्रों की वेशभूषा से आसानी से पहचाना जा सकता है, लेकिन फिल्म के किसी भी अंश में कोई पात्र या प्रसंग इस बात का संकेत नहीं देता कि उनका संबंध किसी खास क्षेत्र से है। इस फिल्म के गीत जो शकील बदायुंनी ने लिखे थे और जिसका संगीत नौशाद ने दिया था उसका विदाई गीत खड़ी बोली में लिखा गया है लेकिन ब्रज-अवधी के शब्दों के मिश्रण ने उसे लोकगीत का ऐसा गहरा स्पर्श दे दिया है कि वह आज भी विवाह के अवसर पर गाया-बजाया जाता है: ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली, रोए माता-पिता उनकी दुनिया चली’। इस गीत को लोकमय बनाने में इसके संगीत का योगदान सर्वाधिक है। यह संगीत ही है जो लोकचेतना के सर्वाधिक नजदीक है। क्या यह महज संयोग है कि जो गीत अपनी आत्मा और अपनी देह दोनों में पूर्णत: लोकमय है और इसीलिए पूरी तरह भारतीय भी है, उस गीत को महबूब की फिल्म के लिए लिखा शकील बदायुंनी ने, संगीत दिया नौशाद ने, गाया शमशाद बेगम ने और फिल्माया गया नरगिस पर। यह वह साझा विरासत है जिसे हिंदू और मुसलमान के खानों में बांटकर नहीं देखा जा सकता।
फिल्म में संगीत
फिल्म संगीत का सृजन स्वायत्त संगीत कला के रूप में नहीं होता। इसका सृजन फिल्म के एक अंग के रूप में होता है। इसी वजह से उसे मौलिक नहीं मानी जाती, ठीक उसी प्रकार जैसे फिल्म की पटकथा मौलिक रचना नहीं माना जाता। फिल्म की जरूरत के मुताबिक ही गीत और संगीत की रचना की जाती है और सिचुएशन के अनुसार ही उन्हें प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इन सीमाओं के बावजूद भारतीय फिल्म संगीतकारों ने जो मधुर और कर्णप्रिय संगीत रचा है, वह अपनी मिसाल खुद है। भारतीय फिल्म संगीत ने तीन स्रोतों सेे अपने लिए रस ग्रहण किया है-भारतीय शास्त्रीय संगीत, विभिन्न प्रदेशों का लोक संगीत और पश्चिम का शास्त्रीय और पॉपुलर संगीत। संगीतकारों ने इनके संयोग से एक ऐसी संगीत परंपरा विकसित की जो आम आदमी के हृदय को भी स्पर्श करे। पांचवे-छठे दशक में फिल्मी गीत और संगीत का उत्कर्ष इसलिए दिखाई देता है क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों से ऐसे प्रतिभावान और प्रगतिशील रचनाकार जुड़े, जिन्होंने फिल्म की सीमाओं को स्वीकारते हुए भी उसमें कुछ नया कर गुजरने का साहस दिखाया। इस दौर के संगीतकारों ने प्राय: भारतीय रागों में गीतों को प्रस्तुत किया। लेेकिन इन रागों को उनके शुद्ध और शास्त्रीय रूपों में कम, बल्कि जरूरत के अनुसार उनमें इस तरह के परिवर्तन किये, जिससे कि वे राग सामान्यजन की चेतना में आसानी से उतर सकें। फिल्म संगीत की इस बात के लिए आलोचना की जाती रही है कि उसने हमारे शास्त्रीय रागों की शुद्धता को नष्ट किया है। लेकिन ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि ये शास्त्रीय राग भी कभी लोक संगीत का हिस्सा रहे होंगे(यह भारतीय रागों के नामों से साफ है) जिन्हें कालांतर में परिनिष्ठित रूप दिया गया और इस तरह वे शास्त्रीय रूप धारण कर सके। इस तरह वह लोक संगीत जो शास्त्रीय होकर जनता से दूर हो गया था, वही फिल्मों के माध्यम से वापस उसी जनता तक पहुंच रहा था। निश्चय ही अपने पुराने रूप में नहीं, बल्कि नितांत नए रूप में। एक तरह से फिल्मों ने प्राय: लुप्त होती लोक परंपराओं को कुछ हद तक बचाये रखने और नया जीवन प्रदान करने का काम किया। एक अन्य अर्थ में भी फिल्मी गीतों ने लोकगीतों का स्थान ले लिया है, वह यह कि लोकगीतों की तरह फिल्मी गीत भी मनुष्य की विभिन्न स्थितियों और प्रसंगों से जुड़ी सामूहिक भावनाओं और वैयक्तिक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप की फिल्मों की विशेषता रही है कि फिल्म के खास प्रसंग के लिए लिखे गए गीत उससे स्वतंत्र होकर भी दशकों तक लोगों की स्मृतियों का हिस्सा बने रहते हैं।
पिछले दो दशकों में भारतीय सिनेमा ने अपनी जातीय और लोक परंपरा को काफी हद तक भुला दिया है। पहले की तरह अब भारतीय फिल्मों का संबंध ग्रामीण यथार्थ से लगभग खत्म हो गया है। इसके साथ यह भी सच है कि आज बनने वाली अधिकतर फिल्मों में उस मध्यवर्ग का जीवन प्रस्तुत किया जाता है जो महानगरों या विदेशों में रहता है। इस महानगरीय मध्यवर्ग का संबंध उस भारत से खत्म होता जा रहा है जो आज भी देश की कुल आबादी का 80-85 प्रतिशत है। लेकिन फिल्मों में यह बहुसंख्यक जनता लुप्त होती जा रही है। इसका स्थान जिस मध्यवर्ग ने लिया है, उसके लिए भारत की विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं का महत्त्व उतना ही है, जितना कि फैशन की दुनिया में एथनिक पोशाकों का होता है। इस वर्ग के लिए न साझा सांस्कृतिक परंपरा की कोई प्रासंगिकता है, न हिंदुस्तानी जबान की और न ही लोक परंपराओं की। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण की जन विरोधी नीतियों के वर्चस्व और साझा संस्कृति और लोक परंपराओं के विरुद्ध सक्रिय ताकतों के दबाव ने भारतीय सिनेमा की बहुसांस्कृतिक और बहुजातीय परंपरा के सामने चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। साहित्य और अन्य कला माध्यमों के सामने भी ये चुनौतियां मौजूद हैं। साहित्य और अन्य कला माध्यमों की तरह सिनेमा में भी इनसे संघर्ष करने वाली प्रवृत्तियां आज भी सक्रिय हैं।

Thursday, September 20, 2012

सप्तऋषि आश्रम, हरिद्वार



भारत की धार्मिक राजधानी हरिद्वार, यानि कि ऐसा स्थान जहां पहुंचते ही एक अलग सी अनुभूति होती है। ऐसा लगता है मानो भगवान श्री हरि विष्णु के नगर में पहुंच गए हों। जिसके वातावरण में अनुठी पवित्रता और धार्मिकता महसुस होती है। जहां कि फिजाओं में हर पल भगवान के भजन गुंजते रहते हैं। गंगा के निर्मल जल की कल कल ध्वनी हर किसी को मुग्ध कर देती है। साधु-संतों की पावन कुंड नगरी , प्राचीन मंदिर औऱ अनेकों आश्रम, हर एक हरिद्वार की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान है और इस पहचान का एक जीवंत रूप है हरिद्वार का सप्तऋषि आश्रम.....प्रकृति की गोद में बसा ये आश्रम श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ है। इस आश्रम के सामने गंगा नदी सात धाराओं में बहती है। माना जाता है कि जब गंगा नदी पृथ्वी पर बहती आ रही थी तब उनके मार्ग में गहन तपस्या में लीन सात ऋषि आ गए..मां गंगा ने उनकी तपस्या में विघ्न ना डालते हुए स्वंय को सात हिस्सों में विभाजित कर अपना मार्ग बदल लिया......................इसलिए इस आश्रम को सात सागर भी कहा जाता है।
वेद शास्त्रों के काफी खोज बिन के बाद इस ऐतिहासिक स्थान का पुनर्उत्थान किया गया...इस तीर्थ के उद्धार का श्रेय सर गणेश तक को जाता है। स्वतंत्रा पूर्व उन्होने सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के सहयोग से इस आश्रम का निर्माण कराया...देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने इस आश्रम का उद्घाटन किया था...
हरिद्वार से दो कोस की दूरी पर स्तिथ सप्तऋषि आश्रम गंगा के सप्तसरोवर तट पर बना है...यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं...गंगा तट से ऋषिकेश रोड तक फैले इस आश्रम के आस-पास का वातावरण बेहद ही रमणीय है...इस आश्रम में कई मंदिर हैं...इनमें शिवकुंड सरोवर के पास गंगेश्वर महादेव का प्रधान मंदिर सबसे प्राचीन है...मंदिर के द्वार के दोनो तरफ दो सिंह बने हुए हैं...मंदिर के प्रागंण में देवाधिदेव भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा स्थित है...अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण किए भगवान महादेव की रुप की शोभा अलौकिक है...मंदिर की सिढियां सफेद संगमरमर की बनी हुई हैं,,,जिसके दोनों ओर सफेद संगमरमर की बनी हुई दो हाथियां हैं,,,,इन्हे देख कर ऐसा लगता है मानों ये यहां आने वाले हर श्रद्धालु का स्वागत कर रहे हों...      मंदिर के मुख्य पुजा गृह में प्रवेश करते ही भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं....जिसके दर्शन मात्र से भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं...ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ के दर्शन से अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है....मंदिर के भीतरी खम्भों पर परिम्हों और अप्सराओं की बेहद ही खुबसूरत तस्वीरें अंकित हैं...गंगेश्वर महादेव मंदिर में रोजाना सुबह और शाम आरती की जाती है...
अज्ञान को दूर करने वाले गंगेश्वर महादेव मंदिर की परिक्रमा में ही छोटे-छोटे 9 मंदिर बने हुए हैं....इन 9 मंदिरों में  सात मंदिर सप्तऋषियों के हैं...सप्तऋषि मंदिर के बाहरी दिवारों पर प्रतिहारी की मुर्तियां हैं....मंदिर में सप्तऋषियों यानि कश्यप, वशिष्ट, अत्री, विश्वामित्र, जमदाग्नि, भारद्वाज और गौतम ऋषि की प्रतिमाएं स्थापित है...प्रधान गौत्र प्रवर्तक ऋषिओं में सात सप्तऋषियों को मानव जाति का पिता कहा जाता है,,,,यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ये बेहद पूज्यनिय है...इसके अलावा इस परिसर में वशिष्ट पत्नि अरूंधती की भी मुर्ति स्थापित की गई है...ये भी श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धेय है..इसके साथ यहां मां गंगा जी का मंदिर स्तिथ है...मनोहारी मुर्तियों को अपने अंदर संजोए इस मंदिर में आने के बाद श्रद्धालुओं को आत्मिक सुख और शांति मिलती है...मंदिर की भीतरी दिवारों पर स्वामी राम तिर्थ महाराज और गुरूनानक देव जी की भी तस्वीरे हैं...इसके अलावा दिवारों पर श्लोक भी लिखे गएं हैं...जिसमें मां गंगा और हरिद्वार की महिमा का ब्खान किया गया है... गंगेश्वर महादेव मंदिर की दांयी ओर राम पंचायत मंदिर है..मंदिर में श्री राम..............माता सिता....और लक्ष्मण के अलावा.....उनके भाई भरत और शत्रुघ्न की भी प्रतिमा है....यही नही इस मंदिर में भगवान राम के गुरू की भी मुर्ति स्थापित है...सूर्य रंग के सिंहासन पर विराजमान भगवान राम और माता सिता की मनोहर छवि के दर्शन पाकर मन आनन्द से भर जाता है....इस मंदिर में श्रीराम के शिव पूजन की तस्वीर है...अपने आराध्य भगवान शिव की पूजा करते भगवान की ये तस्वीर उनके भक्त रूप को रुपाहित करती है....गंगेश्वर महादेव की बांयी तरफ भगवती दुर्गा मंदिर है....शेर पर सवार मां भगवती भक्तों के दुखों को हरने वाली है,,,,,माता का दिप्त प्रभा मंडल श्रद्धालुओं में ऊर्जा का संचार कर देता है.....मां के मंदिर में भगवान शिव, सिता श्रीराम माता लक्ष्मी के सात चतुर्भुजी भगवान विष्णु और राधा-कृष्ण की तस्वीरें हैं.....जिनके सामने श्रद्धालु पुरी तरह से नतमस्तक हो जाते हैं....इसके अलावा सिता राम के प्रति अपनी अथाह भक्ति का प्रमाण देते श्री हनुमान  जी की भी तस्वीर है....जिसके देख श्रद्धालों के मन में भक्ति की अमृत धारा बहने लगती है....भगवती दुर्गा मंदिर के पास ही कृष्ण मंदिर है,,,,मंदिर में श्री राधा-कृष्ण की अप्रीतम प्रतिमा प्रतिष्ठित है...श्रृंगार से परिपूर्ण उनकी प्रतीमा भक्तो की आंखों से सिधे हृदय में उतर जाती है....इस मंदिर में भी मीनाकारी की अद्भुत मिशाल देखने को मिलती है....मां भगवती और राधा कृष्ण मंदिर के बीच में हनुमान जी का भी एक मंदिर  है.....इस मंदिर में मुकुटधारी हनुमान जी की अलौकिक प्रतीमा स्थित है....उनकी प्रतीमा से शौर्य, तेज और पराक्रम साफ झलकता है.....श्री हनुमान जी की इस मंदिर में धनुष-बाण धारण किए भगवान श्रीराम की बडी ही मोहक तस्वीर है...  इसके प्रभु श्रीराम लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाए हनुमान जी की भी तस्वीर भी यहां है....सप्तऋषिआश्रम में मां सरस्वती का मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है.....सफेद रंग के इस मंदिर में ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतीमा स्थापित है...श्वेत वस्त्र धारिणी, वीणा धारिणी मां सरवस्ती के दर्शन मात्र से ही सारे अवगुण दूर हो जाते हैं...इस आश्रम में श्री गणेश जी का मंदिर स्थित है.....इस मंदिर में चार भुजाओं वाली गजानन की प्रतीमा स्थापित है...प्रथम आराध्य श्री गणेश जी की पूजा से मनुष्य को सारी सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं...शिध्र ही प्रसन्न होने वाले विघ्न विनाशक की श्रद्धालु सच्चे मन से श्रद्धा करते हैं...सप्तऋषि आश्रम में तिरूपति बालाजी का मंदिर भी स्थित है....मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की प्रभावशाली प्रतीमा है....सप्तऋषि आश्रम में आश्रम के उद्धारक औऱ सनातन धर्म के सर्वमान्य नेता सवर्गीय त्यागमुर्ति श्री गोस्वामी श्री गणेशदत्त महाराज की विशाल संगमरमर की मूर्ति है....मूर्ति के सामने ही उनका विशाल कीर्ति स्तंभ है....जो उनकी कठोर तप्सया, त्याग और सेवा भावना का परिचायक है...यहां आने वाले श्रद्धालु आज भी उनके पवित्र आत्मा से प्रेरणा लेते हैं....40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है...इसकी सबसे बडी खासियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी....
40 विघे में फैले सप्तऋषि आश्रम में एक बडे आकर्षण का केन्द्र यज्ञशाला है..इसका उदघाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद ने किया था...1954 में इस यज्ञशाला में वेद मंत्रो से अग्नि प्रज्वलित की गई थी...इसकी सबसे बजी खाशियत है कि यज्ञशाला की ये ज्योति लगातार 101 सालों तक जलती रहेगी...यहां आने वाले श्रद्धालु हवन कुंड में विधि पूर्वक आहुती डाल कर  अपनी मनोकामना पूरी करते हैं....यहां यज्ञ में आहुती देते कई ऋषियों की तस्वीरें भी हैं.....जो वातावरण में स्वच्छता और पवित्रता का एहसास कराती हैं..यज्ञशाला के अलावा आश्रम में बनी कुटीया भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण हैं...हरे भरे पार्क के बीच बनी यें कुटीयां सप्तऋषियों और उनकी पत्नियों के नाम पर बनी हुई हैं,,,ये कुटीयां साधुओं , महात्माओं और श्रद्धालुओं के भजन, पाठ, योगाभ्यास और स्वाध्याय के लिए बहुत ही अनुकुल हैं... शुरूआत में इन कुटियों की संख्या 14 थीं..लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या बढ़ कर 40 के करीब हो गई हैं...
भक्ति की धारा के साथ ही सप्तऋषि आश्रम में ज्ञान की धारा भी बहती है....और ये धारा बहती है आश्रम में स्थित संस्कृत विद्यालय में...इसका उदघाटन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने किया था....300 से ज्यादा विद्यार्थियों वाले इस महाविद्यालय में प्रथमा से लेकर आचार्य तक की निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है...इसके अलावा विद्यार्थियों को यहां योग की भी शिक्षा दी जाती है...
काशी विश्व विद्यालय से मान्यता प्राप्त इस महाविद्यालय में स्व विद्यार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र और निवास की निशुल्क व्यवस्था है....जिसकी पुरी जिम्मेदारी सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा निभाती है...
 संस्कृत महाविद्यालय के अलावा सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा देशभर में शिक्षा के उत्थान के प्रयासरत है...प्रतिनिधि सभा देश भर में कई इण्टर कालेज और विश्वविद्यालयों का संचालन कर रही है,,,,सनातन धर्म सभा मानव सेवा के अलावा गौ सेवा को भी अहम धर्म मानती है...इस सेवा की ही रूप देखने को मिलता है आश्रम में स्थित गौशाला में...आश्रम में बनी गौशाला में 60 से भी अधिक गाय, बैल और बछड़ों का पालन किया जाता है...इस गौशाला का मकसद गौ सेवा के साथ गौ रक्षा भी है...
 गौ सेवा को हिन्दु धर्म में मातृ सेवा से बढकर माना जाता है,,कहा जाता है कि जिस घर में गौ सेवा की जाती है वहां सदैव खुशियों का बसेरा होता है...

सनातन तकनिकि सभा सामाजिक दायित्यों के निर्वहन में भी हमेशा आगे रहती है...इस आश्रम में प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है....जिसमें विद्यालय के छात्र, आश्रम के कर्मचारी और अतिथियों को मिलाकर लगभग 250 व्यक्तियों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है... सप्तऋषि आश्रम में एक धर्मार्थ औषधालय भी है...जिसमें आश्रम में रहने वाले छात्रों , कर्मचारियों और साधकों के अलावा आस-पास रहने वाले संतो-सन्यासियों और ग्रामिणों का निशुल्क इलाज किया जाता है...हिन्दु धर्म को मानने वालों के लिए सप्तऋषि आश्रम बहुत ही पवित्र स्थल है...माना जाता है कि इस स्थान पर सबसे पहले श्रीमदभागवत की कथा सुनाई गई...कहा जाता है कि सप्तऋषि आश्रम का संबंध हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय से भी है...संसार से विरक्त होने के बाद उन्होने कुछ समय इस पावन धरती पर भी बिताया था....

मानव सेवा, पशु सेवा, पवित्रता, धार्मिकता और श्रद्धा का प्रयाय बन चुके इस आश्रम का मकसद सम्पूर्ण मानव जाति की उन्नती और खुशी है...ऋषिओं के कृपा से बना हरिद्वार का दर्शनिय तिर्थ सप्तऋषि आश्रम पूर्णदायी, पापों को हरने वाला और सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है...ऐसे में इस आश्रम में आने वाले सभी श्रद्धालुओं को आस्था के साथ कभी ना भुलने वाला अदभुत अनुभव प्राप्त होता है...देश-विदेश से सप्तश्रषि आश्रम आने वाले भक्तों को यहां आकर भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। सप्तऋषि आश्रम के लिए यातायात के साधन सुलभ हैं...यहां से सबसे नजदीकी दिल्ली एयरपोर्ट है जो लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर है...सबसे निकटवर्ती रेवले स्टेशन हरिद्वार है, जो यहां से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है, दूसरा रेलवे स्टेशन ऋषिकेश भी महज कुछ किलोमीटर दूर है,  सप्तऋषि आश्रमं तक पहुंचने के लिए हरिद्वार से ऋषिकेश होकर जाने वाली सड़क ही मुख्य मार्ग है, यहां जाने के लिए बसें,,,आटो रिक्सा के अलावा तांगे की भी सुविधा उपलब्ध है...इसके अलावा हरिद्वार से हर एक डेढ घंटे बाद सप्तऋषि आश्रम के लिए बसे जाती हैं। यात्रियों को ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं और अतिथि निवास बने हैं, इसके अलावा स्थानीय पंड़ों द्वारा भी यात्रियों के रहने की व्यवस्था होती है ।

सुसाइड टेंडेंसी



समाज में बढ़ रही सुसाइडल टेंडेंसी खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। आजकल छात्र अच्छे मार्क्स ना मिलने के कारण तो कभी फेल होने जैसा जरा सी बात पर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहे हैं। इसके अलाला कई ऐसे ही कारण है जो लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। ये टेंडेंसी केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में बहुत तेजी से फैल रही है,,,, कई बार दिमाग में बहुत परेशान करने वाले विचार उठते हैं, जो मानसिक एवं साइकोलॉजिकल बीमारियों के कारण होते हैं। अगर इन विचारों को रोका या बदला नही गया तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। ऐसे में लोगों को तुरंत मेडिकल हेल्प की जरूरत होती है। ऐसे सुसाइडल विचार दो प्रकार के होते हैं। एक एक्टिव- जिसमें इंसान सुसाइड करने की सोचता है और उसे पूरा करने के लिए प्लान बनाता है। दूसरा पैसिव- इसमें इंसान को सुसाइड करने का विचार तो आता है पर उसके पास हिम्मत नहीं होती। ये दोनों ही तरह के विचारों को अगर एक्सप्रेस करने की सही जगह मिले तो वह ऐसा निगेटिव काम करने से बच सकता है,,,,,,वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या की प्रवृत्ति अब महामारी बनती जा रही है। आत्महत्या करने वालों में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि चार मिनट में एक व्यक्ति जान दे देता है। और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी देश में हर 10 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान दे रहा है। आमतौर पर ये देखा गया है कि पढाई और प्यार में असफलता के बाद आत्महत्या ही युवाओं को अंतिम समाधान नजर आता है। इसमें अभिभावकों के पास समय न होने के साथ ही फिल्म और इंटरनेट अहम भूमिका निभा रहे हैं। सुसाइडल टेंडेंसी वाले इंसानों की समय पर पहचान करना और उनकी कांउसलिंग करना बहुत जरूरी है,,,अगर कोई इंसान उदास, गुमसुम, परेशान और खोया-खोया रहे और सबसे अलग रहना चाहे तो समझ लीजिए कि वो नॉरमल नहीं है,,,इसके साथ अगर कोई खुद को हेल्पलेस, निराश, जीवन को बेकार माने या पहले कभी सुसाइड का प्रयास कर चुका हो तो उसे ड्रग्स और एल्कोहल से दुर रखना चाहिए क्योंकि वो भी ऐसे कदम उठा सकता है। सुसाइड करने वाले की मानसिकता बहुत अलग होती है ये कुछ सेकेंडों का दौर होता है अगर किसी तरह उस समय को टाल दिया जाए तो इंसान सुसाइड करने का इरादा बदल सकता है। भारतीय कानून में आत्महत्या एक सामाजिक अपराध है और ऐसा करने से दूसरे लोगों की मानसिकता पर भी इसका असर पड़ता है। सुसाइड करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और जब कभी भी आपके दिमाग में ऐसे ख्याल आएं तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें। हम लोगों को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि बुरे वक्त का हिम्मत के साथ मुकाबला करना चाहिए क्योंकि ये प्रकृति का नियम है कि इंसान के जीवन में बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त जरूर आता है।
 

पायरिया की समस्या


दांतों को सेहत और सुंदरता का आईना माना जाता है। लेकिन, खाने के बाद मुंह की साफ-सफाई न करने से दांतों में कई तरह की बीमारियां शुरू हो जाती हैं। दांतों की साफ-सफाई में कमी के कारण जो बीमारी सबसे जल्दी होती है वो है पायरिया। सांसों की बदबू, मसूड़ों में खून और दूसरी तरह की कई परेशानियां पायरिया के लक्षण हैं। दातों की साफ-सफाई न करने के कारण पायरिया एक सामान्य बीमारी बन गई है। पायरिया के कारण असमय दांत गिर सकते हैं। डिब्बाबंद खाने की चींजे, चॉकलेट्स, आइसक्रीम, शक्कर, मैदा, पालिश वाले चावलों की ओर ज्यों-ज्यों हमारा आकर्षण बढ़ रहा है, त्यों-त्यों इस बिमारी से परेशान लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल मुंह में लगभग 700 किस्म के बैक्टीरिया होते हैं, जिनकी संख्या करोडों में होती है। यही बैक्टीरिया दांतों और मुंह को बीमारियों से बचाते हैं। अगर मुंह, दांत और जीभ की सफाई ठीक से न की जाए तो ये बैक्टीरिया दांतो और मसूडों को नुकसान पहुंचाते हैं। पायरिया होने पर दांतों को सपोर्ट करने वाली जबडे की हड्डियों को नुकसान होता है। पायरिया शरीर में कैल्शियम की कमी होने से मसूड़ों की खराबी और दांत-मुंह की साफ सफाई में कोताही बरतने से होता है। इस बीमारी में मसूड़े पिलपिले और खराब हो जाते हैं और उनसे खून आता है। सांसों की बदबू की वजह भी पायरिया को ही माना जाता है।
 पायरिया की रोकथाम के लिए खाने में खनिज की मात्रा होनी चाहिए जो चोकरयुक्त आटा, दूध, ताजे फल व हरी सब्जियों में अधिक मात्रा में मिलती है। इनका सेवन कर पायरिया से बचाव किया जा सकता है। शरीर के अन्य अंगों की तरह दांतों की रेगुलर एक्सरसाइज बहुत जरूरी है, जो हलुआ-पूरी खाने से नहीं बल्कि कच्ची सब्जियां खाने से और सुबह शाम मुट्ठी भर भीगे हुए गेहूं-चना लेने से हो सकती है। अंकुरित गेहूं में विटामिन "ई" पाया जाता है जो कि पायरिया के अलावा नपुंसकता, बांझपन, जख्म जल्दी न भरना जैसे बिमारियों में बहुत फायदेमंद है। पायरिया का अगर समय पर इलाज न कराया जाए तो दांत ढीले होकर गिर जाते हैं। पायरिया का इलाज बडी आसानी से हो सकता है। पायरिया की समस्या होने पर जल्द से जल्द चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
  

अलीगंज का हनुमान मंदिर



हिन्दुस्तान का दिल उत्तरप्रदेश...  भारतीय संस्कृति का वो जगमगाता दीपक....जिसकी रोशनी की अलग ही प्रभा और प्रभाव है....अनेकता में एकता का वो गुलदस्ता.....जिसे प्रकृति ने अपने हाथों से सजाया है..... जिसका सतरंगी सौंदर्य मनमोहक है.......स्मारक, मंदिर, स्तूप, किले और महल जिसकी पहचान हैं........कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास, जिसकी आवोहबा में हर पल तैरती रहती है... जहां लोक-नृत्य और संगीत की रसधारा सहज रुप से फूटती रहती है..... जिस धरती पर सजती है, संतों की ज्ञान धारा में धर्म की महफिल.... उसी महफिल का एक मुकाम उत्तरप्रदेश का लखनउ शहर भी है..... ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी...शौर्य, साहस के अनंत जीवंत प्रमाणों का गवाह... अनेक संस्कृतियों के संगम का केंद्र....सांस्कृतिक विरासत के साथ ही जिसमें आधुनिकता के रंग भी मिल हुए हैं.. अपने किलों और खूबसूरत मंदिरों के लिए मशहूर लखनउ , आज भी भक्तों के लिए धर्म और आस्था का अहम पड़ाव है.... और इन्हीं अहम पड़ावों में एक है....नया हनुमान मंदिर....रामायण काल में लक्ष्मणजी का राज्य रहा लखनउ में स्थित नया हनुमान मंदिर भारत के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है...आदि काल से ही नया हनुमान जी की महिमा इस जगत में व्याप्त है....लखनउ के अलीगंज इलाके में स्थित नया  हनुमान जी का मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है.....जहां जाति, धर्म और संप्रदाय की सभी सीमाएं टूटती नजर आती है.....सभी धर्म के लोग जहां एक ही माला में गुंथे होते हैं....चाहे राजा हो या रंक, इस दर पर सभी शीश झुकाते हैं....इस दर पर मांगी गई कोई भी दुआ खाली नहीं जाती...यहां आने वाले हर शख्स की मुरादें पुरी होती है....अभिशप्त आत्माएं यहां मुक्ति पाती हैं....लखनउ का नया हनुमान मंदिर काफी चमत्कारी माना जाता है...जिसकी वजह से ये स्थान न केवल उत्तरप्रदेश, बल्कि पूरे देश में विख्यात है.... इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की मूर्ति किसी कलाकार द्वारा निर्मित नहीं बल्कि धरती से गर्भ से प्रकट हुई है। मंदिर को देखते ही मन में शांती और सुकुन की एहसास होने लगता है।  मंदिर में रोज हजारों भक्त भगवान के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आते हैं। इस मंदिर में चौबिंसो घंटे रामायण का पाठ होता रहता है। बजरंगबली के भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव से स्वंय रामायण का पाठ करते हैं। भक्तों की सारी मान्यता हनुमान मंदिर में पहुंचते ही पुरी जाती है और भक्त हर मंगलवार और शनिवार को पुरे परिवार के साथ भगवान के दर्शन को जरूर आते हैं। मंदिर में होने वाली आरती में बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी शामिल होते हैं..भगवान की आरती समय स्रोत का निरंतर पाठ होता रहता है..आरती की दौरान भक्ति के कई रुप देखने को मिलते हैं..कोई हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा होता है, तो कोई ताली बजा कर प्रभु की भक्ति में लीन होता है...तो कई भक्त लगातार मंदिर की घंटियों को बजाते रहते हैं.....आरती खत्म होने के बाद भगवान श्रीराम का आशीर्वाद समझ कर भक्तआरती की लौ अपने चेहरे पर लगाते हैं। श्री खेड़ापति को सच्चे मन चढाया गया कोई भी प्रसाद स्वीकार्य है। परिवार के सुख-शाति की कामना के लिए रोजाना हवन का भी आयोजन किया जाता है...जिसमें हलवा-पूरी से लेकर कई तरह की सामग्रियों की आहुति दी जाती है...जिससे हवन की अग्नि पूरी तरह प्रज्जवलित हो उठती है...जिसकी ज्वाला में सारी उपरी बाधाएं जलकर राख हो जाती है...


अलीगंज में स्थित नया हनुमान मंदिर की बनावट देखने ही यह प्रतीत होता है कि इस मंदिर का निर्माण सैकड़ों साल पहले किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार की बनावट काफी मनमोहक है। जैसे ही मंदिर के मध्य परिसर में भक्त पहुंचते हैं तो वहां उनकों घंटीयों वाली एक लंबी दिवार देखने को मिलता है। जो कि पहली ही दृष्टि में काफी मनमोहक लगती है। इन घंटीयों के बारे में मान्यता है कि इसको बजाने से  प्रभु श्री राम भक्तों की पीड़ा-वेदना समझ कर पवनपुत्र को तत्काल भक्तों के कष्टों के निवारण का आदेश देते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश करने से पहले ही दिखाई देती है....हनुमानजी के आराध्य प्रभु श्रीराम की प्रतिमा...जो मंदिर के ठीक बीचो-बीच प्रतिष्ठित है...धनुर्धारी प्रभु राम की ये आकर्षक प्रतिमा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध करती है और हनुमान जी प्रभु श्रीराम के चरणो में विराजे हुए हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि कभी लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस नगरी से बहती हुई गोमती नदी के उस पार 19वीं शताब्दी में नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी और दिल्ली के मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम द्वारा बसाये गये अलीगंज मोहल्ले में नया हनुमान मंदिर स्थित है। यहा पर हर ज्येष्ठ मास के प्रत्येक मंगलवार को हिन्दुओं और मुसलमानों की ओर से श्रद्धा पूर्वक मनौतियां मानी जाती है और चढावा चढाया जाता है। लखनऊ में मोर्हरम और अलीगंज का महावीर मेला ये ही दो सबसे बड़े मेले होते हैं। मेले में लगभग एक सप्ताह पहले से ही दूर-दूर से आकर हजारों लोग केवल एक लाल लंगोट पहने सड़क पर पेट के बल लेट लेट कर दण्डवती परिक्रमा करते हुए मंदिर जाते हैं। इस मंदिर का इतना महत्व होने से आम तौर पर लोगों के मन में आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है। 14वीं शताब्दी के आरम्भ में बख्तियार खिलजी ने इस हनुमानबाड़ी का नाम बदल कर इस्लामबाड़ी रख दिया, जो आज तक चला आ रहा है। इसके बहुत दिन बाद अवध के त्तकालीन नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया के जब कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई औऱ बहुत से हकीम –वैद्यों की दवाइयों और पीर-फकीर की दुआओं ने भी जवाब दे दिया, तब कुछ लोगों ने उन्हें इस्लामाबाड़ी के बाबा के पास जाकर दुआ मांगने की सलाह दी। कहते हैं कि वे इस्लामाबाड़ी गई औऱ सन्तान की कामना की। उनकी अभिलाषा पूरी हुई। लोंगो का मानना है कि जब वे गर्भवती थीं, तब उन्हें फिर स्वप्न आया, जिसमें उनके पुत्र ने उनसे कहा कि इस्लामाबाड़ी में उसी जगह हनुमान जी का मूर्ति गड़ी है, उसे निकलवाकर किसी मंदिर में  प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। फलत बच्चे के जन्म के बाद रबिया बेगम वहां गयीं औऱ नवाब के सैनिकों ने टीला खोद डाला तथा नीचे से मुर्ति निकाल ली गयी। बाद में उसे साफ सुथरा करके, नवाबी आदेश से सोने चांदी तथा हीरे जवाहरात से सजाकर  हाथी पर रखा गया  ताकि आसफुदौला के बड़े इमामबाड़े के पास ही उसे प्रतिष्ठापित करके मंदिर बनवाया जाय। इस हाथी को लेकर जब सब जा रहे थे तह सड़क के अंतिम छोर पर पहुंचकर उस हाथी ने आगे बढने से इन्कार कर दिया। महावत ने लाख कोशिश की लेकिन हाथी ज्यों का त्यों अड़ा रहा। अन्त में जब उस बाड़ी के साधु ने कहा कि रानी साहिबा हनुमान जी गोमती के उस पार नहीं जाना चाहते, क्योंकि वह लक्ष्मणजी का क्षेत्र है। तब बेगम साहिबा ने वहीं सड़क के किनारे, गोमती तट के निकट मुर्ति स्थापित करा दी औऱ उस साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर बनवा दिया। साथ ही उस साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर का महंत नियुक्त तक दिया गया। मंदिर के लिए उसके आस-पास की अधिकांश जमीन महमूदाबाद रियासत की ओर से मुफ्त में दे दी गयी।

जहां तक नया हनुमान मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ का सवाल है, तो यहां बारहों महीनें भक्तों  का तांता लगा रहता है....देश के सुदूर क्षेत्रों से यहां दर्शानार्थी आते रहते हैं....लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष कार्यक्रम होता है...इस विशेष दिन भक्तों की भारी भीड़ यहां हनुमान जी के दर्शन के लिए आती है...आसपास के लोगों के लिए हनुमान जी का दर्शन उनकी दिनचर्या का ही हिस्सा है.....भक्त और भगवान का ये मिलन वैसे तो आम बात है, लेकिन, इस मिलन के बाद भक्तों के चेहरों पर जो संतोष भाव होता है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है.....देश के मध्य में स्थित होने के कारण किसी भी हिस्से से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है....यहां पहुंचने के लिए सड़क, वायु और रेल मार्ग को अपनी सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है। लखनऊ का मालनपुर एयरपोर्ट, दिल्ली, मुम्बई, कोलकात्ता और चेन्नई जुड़ा है। यहां से टैक्सी और बस के माध्यम से लखनऊ आसानी से पहुंचा जा सकता है और लखनऊ पहुंचने के बाद लोकल सवारियों के अलीगंज के इस प्राचीन मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। रेल मार्ग से लखनऊ पहुंचना बहुत ही सरल है... लखनऊ का दिल्ली, मुम्बई और देश के दूसरे शहरों रेल से सीधा संपर्क है... इसके साथ ही लखनऊ देश के कई शहरों से सड़क मार्ग से भी जुडा हुआ है...अक्टूबर से लेकर मार्च का महीना लखनऊ जाने के लिए सबसे उत्तम है....





फरीदाबाद का शनि मंदिर


भारत में शनिदेव के कई पीठ है किंतु तीन ही प्राचीन और चमत्कारिक पीठ है, जिनका बहुत महत्व है और इन्ही शनिपीठों में जाकर ही पापों की क्षमा माँगी जा सकती है। विद्वानों का मत है कि उक्त स्थान पर जाकर ही लोग शनि के दंड से बच सकते हैं, किसी अन्य स्थान पर नहीं। जीवन में किसी भी तरह की कठिनाई हो या शनि ग्रह का प्रकोप है, लेकिन यहाँ जाकर लोग भय‍मुक्त हो जाते हैं। हिन्दु मान्यता के अनुसार भक्त को तत्काल लाभ मिलता है। कहते हैं कि पिछले कई हजारों वर्षों से यह पीठ आज भी ज्यों के त्यों है और आज भी यहाँ चमत्कार घटित होते रहते हैं। हमारे देश में केवल तीन ऐसे शनि मंदिर है जिसे शनिपीठ के रूप में जाना जाता है और यहीं जाकर हम अपने गुनाहों की माफी शनि देव से मांग सकते हैं। जिनमें से एक महाराष्ट्र के शिंगणापुर में शनि का प्राचिन मंदिर है वहीं दुसरा मंदिर है शनिचरा मंदिर जो कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पास स्थित है। शनि का तीसरा सिद्द पीठ उत्तरप्रदेश के कोशी से छह किलोमीटर दूर कौकिला वन में स्थित है । इसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहाँ शनिदेव के रूप में भगवान कृष्ण विद्‍यमान रहते हैं और जो भी भक्त इस वन की परिक्रमा करके शनिदेव की पूजा करेगा वहीं कृष्ण की कृपा पाएगा। उस पर से शनिदेव का प्रकोप भी हठ जाएगा। शनि के सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र और इंद्रनीलमणि के समान। यह गिद्ध पर सवार रहते हैं। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहते हैं। शनि को सूर्य का पुत्र माना जाता है। उनकी बहन का नाम देवी यमुना और माता का नाम छाया है। हमारे यहां गलत रित है कि शनिदेव की दृष्टि अगर किसी व्यक्ति पर पड़ती है तो उसका हमेशा बुरा ही होता है लेकिन ये मान्यता सरासर गलत है बल्कि श्री शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे न्यायप्रिय ग्रह हैं, जीवों को उनके कर्मो के आधार पर फल देते हैं। यदि उनकी दया-दृष्टि पानी हो तो अपना कर्म सुधारना चाहिए। ऐसा करने से हमारा जीवन अपने आप सुधर जाएगा। शनि जयंती पर सुख और समृद्धि के लिए श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए। श्री शनिदेव को इस दिन किया गया तैलाभिषेक बहुत ही फलदायी होता है। इससे शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होकर शनिभक्तों को सभी बाधाओं से छुटकारा दिलाते हैं। इस दिन जो भी शनिदेव की पवित्र मन से पूजा-पाठ करता है, उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन गरीब, असहाय व जरूरतमंद लोगों की सेवा व सहायता करने वाले लोगों पर भी श्रीशनिदेव की विशेष अनुकंपा होती है। श्री शनिदेव अपने भक्तों में किसी प्रकार का खोट देखना पसंद नहीं करते। यदि भक्त से कोई खोट होता है तो उसे तुरंत दंड देकर उसकी भूल सुधारने का संकेत देते हैं। याद रहे, शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं। उनकी अनुकंपा पानी हो तो अपना कर्म सुधारें, आपका जीवन अपने आप सुधर जायेगा। शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे हमारे कर्मो के आधार पर फल देते हैं। वे जीवों को उनके कर्मफलों का भुगतान करवाते हैं। इतना ही नहीं, श्री शनिदेव मनुष्य को उसके कर्म बंधनों से मुक्त कर उसका जीवन सार्थक करने का रास्ता भी दिखाते हैं। शनिदेव सौरमंडल के प्रमुख ग्रह हैं। हिदुं धर्म में शनि के प्रभावों को देखते हुए इन्हें भाग्य विधाता भी कहा जाता है। जन्म कुंडली के बारह भावों में श्रीशनिदेव की स्थिति भी किए गए कर्मो के अनुरूप ही होती है। यदि व्यक्ति के कर्म खोटे होते हैं तो उनके फल श्रीशनिदेव उनके अनुरूप ही प्रदान करते हैं। इसके लिए उनपर दोष लगाना उचित नहीं।
 - शनि के पिता और माता सूर्यदेव और छाया है।
- शनि के भाई-बहन यमराज, यमुना और भद्रा है। यमराज मृत्युदेव, यमुना नदी को पवित्र व पापनाशिनी और भद्रा क्रूर स्वभाव की होकर विशेष काल और अवसरों पर अशुभ फल देने वाली बताई गई है।
- शनि शिव को अपना गुरु बनाया और तप द्वारा शिव को प्रसन्न कर शक्तिशाली बने।
- शनि का रंग कृष्ण या श्याम वर्ण सरल शब्दों में कहें तो काला माना गया है।
- शनि का जन्म क्षेत्र - सौराष्ट क्षेत्र में शिंगणापुर माना गया है।
- शनि का स्वभाव क्रूर किंतु गंभीर, तपस्वी, महात्यागी बताया गया है।
- शनि, कोणस्थ, पिप्पलाश्रय, सौरि, शनैश्चर, कृष्ण, रोद्रान्तक, मंद, पिंगल, बभ्रु नामों से भी जाने जाते हैं।
- शनि के जिन ग्रहों और देवताओं से मित्रता है, उनमें श्री हनुमान, भैरव, बुध और राहु प्रमुख है।
- ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक कुम्भ और मकर शनि की प्रिय राशियां है।
- शनि को भू-लोक का दण्डाधिकारी व रात का स्वामी भी माना गया है।
- शनि का शुभ प्रभाव अध्यात्म, राजनीति और कानून संबंधी विषयों में दक्ष बनाता है।
- शनि की प्रसन्नता के लिए काले रंग की वस्तुएं जैसे काला कपड़ा, तिल, उड़द, लोहे का दान या चढ़ावा शुभ होता है। वहीं गुड़, खट्टे पदार्थ या तेल भी शनि को प्रसन्न करता है।
- शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि को अनुकूल करने के लिये नीलम रत्न धारण करना प्रभावी माना गया है।
- शनि के बुरे प्रभाव से डायबिटिज, गुर्दा रोग, त्वचा रोग, मानसिक रोग, कैंसर और वात रोग होते हैं। जिनसे राहत का उपाय शनि की वस्तुओं का दान है।
- शनिश्चरी अमावस्या के दिन लोहे के बर्तन में तेल भरकर उसमें 7 दाने काले चने के, 7 दाने जौ के, 7 दाने काली उड़द के तथा सवा रुपया रखकर उसमें अपना मुंह देखकर दान करें या शनि मंदिर में रख दें।
- शनिवार के दिन काले भैंसे या घोड़े को काले चने खिलाएं।
- शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर सात परिक्रमा करें और सात बूंदी के लड्डू काले कुत्ते को खिलाएं।
- योग्य ज्योतिषी से राय लेकर शनि रत्न नीलम गाय के कच्चे दूध व गंगाजल में पवित्र कर धारण करें।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव कश्यप वंश की परंपरा में भगवान सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शनि को काश्यपेय नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि श्री शनिदेव की उत्पत्ति महर्षि कश्यप के काश्यपेय यज्ञ से हुई थी। सूर्य देव की द्वितीय पत्नी छाया के गर्भ से जन्में शनि के श्याम वर्ण को देख कर सूर्य ने अपनी पत्नी पर आरोप लगायें और शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया । तभी से शनि देव अपने पिता सूर्य से शत्रुभाव रखते हैं। इन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या पर अनेक शक्तियां प्राप्त की और नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया । यमराज शनिदेव के भाई और यमुना बहन हैं । भाई दूज पर यमुना स्नान करने वाले भाई बहनों को शनि और यमराज की पीड़ा नहीं सताती । स्वभाव से गम्भीर त्यागी, तपस्वी, हठी, क्रोधी शनिदेव न्यायप्रिय हैं और हनुमान, काल भैरव, बुध और राहू के मित्र हैं तथा कुम्भ और मकर इनकी प्रिय राशि है । शनि देव व्यक्ति के सुख और स्वास्थ्य पर भी अपने ढंग से प्रभाव डालते हैं । पुराणों के अनुसार शनि को परमशक्ति परमपिता परमात्मा ने तीनों लोक का न्यायाधीश नियुक्त किया है। शनिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उनके किए की सजा देते हैं और ब्रह्मांड में स्थित तमाम अन्यों को भी शनि के कोप का शिकार होना पड़ता है। पुराणों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय करता है तो वह शनि की कोप से बच नहीं सकता।  शनि के शुभ प्रभाव से लम्बे समय तक सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हैं, जबकि अशुभ प्रभाव होने पर व्यक्ति को दुख, मानसिक प्रताड़ना, दरिद्रता , भय तथा पेट, आंख , दांत रोगों के साथ ही अंग-भंग जैसे दु:ख झेलने पड़ते हैं। इसके अलावा शराब पीने वाले, माँस खाने वाले, ब्याज लेने वाले, पराई स्त्री के साथ दुराचार करने वाले और ताकत के बल पर किसी के साथ अन्याय करने वाले का शनिदेव 100 जन्मों तक पीछा करते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार शनिदेव मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। यह धरती और शरीर में जहाँ भी तेल और लौह तत्व है उस पर राज करते हैं। शरीर में दाँत, बाल और हड्डियों की मजबूत या कमजोरी का कारण यही हैं। शनिदेव से सभी डरते हैं क्योंकि ज्योतिष के अनुसार शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के फेर में फँसे व्यक्ति की जिंदगी में तूफान खड़े हो जाते हैं। कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी सभी बाधाओं से मुक्ति का यह सबसे उपयुक्त अवसर है। शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना और काली वस्तुओं का दान करना विशेष शुभकारी माना गया है । शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या पर शनि तीर्थ सिद्ध शनिदेव मंदिर पर विशाल मेला का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के लाखों श्रध्दालु आते हैं । शनिचरी अमावस्या के दिन शनि की पूजा अर्चना करने से शनि देव विशेष फल देते हैं । यदि निश्चल भाव से शनिदेव का नाम ही ले लिया जाये तो व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं, जो व्यक्ति के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का फैसला सुनाते हैं।
उत्तर प्रदेश के कोशी में स्तिथ श्री शनिपीठ मंदिर श्री कृष्ण की जन्मस्थलि मथुरा से 25-30 किलोमीटर दुर है। और मथुरा दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर तथा आगर से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देश भर से शनिभक्त यहां रेल, वायु और सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। कोशी पहुंचने के लिए भक्तों के लिए मथुरा पहुंचना सबसे सरल है और फिर यहां से प्राइवेट और निजि गाडियों से कोशी पहुंचा जा सकता है। रेलमार्ग से आप मथुरा, आगरा और दिल्ली तक आसानी से पहुंचा जा सकता है और यहां पहुंच कर आप सड़क मार्ग से यहां तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा मथुरा रेलवे स्टेशन कोशी के काफी पास में है यहां से आप आटो या टैक्सी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा बस, ऑटो और कई तरह की प्राइवेट टैक्सियां भी चलती हैं दिल्ली, आगरा और मथुरा से शनिमंदिर के लिए चलती हैं। अगर आप वायुमार्ग से यहां पहुंचना चाहते हैं तो दिल्ली और आगरा सबसे नजदीकी एयरपोर्ट हैं और फिर वहां से सड़क मार्ग से कोशी तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।