Wednesday, December 23, 2015

“ ठाकरे परिवार की असंवैधानिक राजनीति ”

भारत एक लोकतांत्रिक देश है लोकतंत्र का मतलब लोगो का लोगो के द्वारा लोगों  के लिए बनाया गया एक तंत्र होता है जिसमें प्रत्येक नागरिक केंद्र और राज्य सरकार बनाने में भागीदारी करता है। भारत का अपना एक संविधान है जिसके अनुसार समाज के प्रत्येक नागरिक को कानूनों का पालन करना पड़ता है। जिससे एक व्यवस्थित और संतुलित समाज की स्थापना होती है और देश की एकता अखण्डता  बनी रहती है।
लेकिन इस सबके बावजूद कुछ लोग अपने हित के लिए भाषावाद और क्षेत्रीयतावाद की राजनीति को जन्म देते है। पिझले कुछ वर्षो से महाराष्ट्र में ऐसे बहुत से उदाहरण देखे गये हैं जिसमें दो दल सर्वोपरी हैं। पहली शिवसेना और दुसरी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) है।
शिव सेना की कमान हाल ठाकरे और उनके पुत्र उद्धव ठाकरे के हाथ में है। दुसरी तरफ मनसे की कमान संभाले हुए है राज ठाकरे जो बाल ठाकरे के ही वंश से सम्बंध रखते है कुछ वर्ष पहले शिवसेना में ही थे लेकिन शिव सेना में अपना भविष्य उज्जवल न दिखने के कारण आपसीमतभेद होने की वजह से शिवसेना का दामन छोड़ दिया । लेकिन शिवसेना के मराठी मुद्दे को राज ने छोड़ा नही बल्कि और मजबुती से पकड़ लिया।
राज ठाकरे के शिवसेना छोड़ने के बाद बाल ठाकरे को एक बड़ा राजनीतिक नुकसान क्षेलना पड़ा क्योेंकि राज ठाकरे शिवसेना में जगह बना चुके थे और काफी संख्या मे लोगों का झुकाव राज ठाकरे की ओर था और समय के साथ बाल ठाकरे से एक अच्छा राजनीतिक अनुभव भी मिल चुका था उसी अनुभव से मनसे बाल ठाकरे की शिवसेना को एक प्रबल प्रतियोगी बनकर चुनौती दे रही है।
महाराष्ट्र में राज ने कई बार यूपी और बिहार के लोगों पर हमले करवाये । उनका मकसद इन लोगों को महाराष्ट्र से बे-दखल करना था । मनसे प्रमुख राज ठाकरे ये नहीं जानते कि भारतीय संविधान के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को भारत राज्य क्षेत्र में अबाध भ्रमण की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 घ), भारत राज्य क्षेत्र में अबाध निवास की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 ड़), और वृत्ति, उपजिवीका या कारोबार की स्वतंत्रता ( अनिच्छेद 19 छ), के अनुसार देश का प्रत्येक नागरिक सारे देश में कही भी रह सकता है और जीवन यापन कर सकता है।
दुसरी तरफ भतिजे राज ठाकरे को चुनौती देने के लिए बाल छाकरे भी नये  तरीकों से मराठी अस्मिता की बात करते है। कभी सचिन जैसे विश्व भर में ख्याती प्राप्त क्रिकेटर का क्रिकेट तक सीमित रहने की हिदायत दे देते है। सचिन का दोष इतना है कि उन्होने कहा था कि मै एक मराठी हूं और सबसे पहले मैं एक भारतीय हुं। इस विषय पर देश भर में बाल ठाकरे की तीखी आलोचना हुई। इसके बाद तो बाल ठाकरे के मुख्य पत्र सामना के संपादक संजय राउत के भाई ने हद ही कर दी। उन्होंने एक प्राइवेट न्यूज चैनल में शिव सैनिकों के माध्यम से तोड़फोड़ और मारपीट करवाई और संजय राउत ने मीडिया को अपनी औकात में रहने की हिदायत दे दी । जो बाल ठाकरे के खिलाफ बोलेगा उसका यही अंजाम होगा। भला ऐसा भी क्या राजनीतिक गुण्ड़ाराज जो मीडिया के बोलने के अधिकार को खत्म करना चाहता हो। पुत्र उद्धव ठाकरे भी पीछे नही रहना चाहते हैं।
स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया( SBI) भर्ती मामले मे दखलअंदाजी करते हैं तो कभी शिव सैनिकों के माध्यम से बॉलीवुड नायकों को साड़ी भेंट करते हैं।
ऐसा लगता है मराठी वोटों के लिए शिवसेना और मनसे में होड सी लगी हो और राज ठाकरे बाल ठाकरे से कह रहे हों "तु डाल डाल मैं पात पात"
मराठी मुद्दे को लेकर राज ठाकरे बाल ठाकरे से एक कदम आगे ही रहते हैं। पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा में पहुंचे मनसे विधायकों ने सपा विधायक अबु आज़मी के साथ हाथापाई की। कारण अबु आज़मी का मात्र भाषा हिन्दी में शपथ लेना था। भारत में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया है और हिन्दी बोलने पर पाबन्दी, ये एक विचारमीय प्रश्न है।
शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे को लगा की भतीजे राज ठाकरे की लोकप्रियता कुछ ज्यादा बढ़ रही है तो उनसे रहा नही गया और आइपीएल मैचों में कूद पड़े । बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान ने आइपीएल मैचों में पाकिस्तान के किसी भी खिलाडी के न चुने जाने पर दुख प्रकट किया जिसका परिणाम यह हुआ कि शाहरुख को बाल ठाकरे ने आईएसआई का ऐजेन्ट बता दिया और उनकी आने वाली फिल्म 'माई नेम इज खान' की महाराष्ट्र में रिलीज टाल दी। जिससे शिवसेना के सामने महाराष्ट्र सरकार कमजोर लगने लगी । लेकिन काफी खींचा-तानी के बाद कड़ी सुरक्षा के बीच फिल्म को रिलीज किया गया। खैर जो भी हो लेकिन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को दो बडे झटके लगे। पहला कांग्रेस महासिव राहुल गांधी का सफल मुम्बई दौरा और शाहरुख खान की फिल्म 'माई नेम इज खान' का रिलीज होना। फिल्म रिलीज के मुद्दे पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने पहले ही साफ कर दिया कि वह फिल्म रिलीज का कोइ विरोध नही करेगें और न ही उन्हें फिल्म से कोइ आपत्ती है। इससे एक बात साफ है कि राजनीति में न ही कोइ स्थाई दोस्त होता है और न कोइ स्थाई दुश्मन।


हमारा देश जाति – धर्म की राजनीति में ही खोखला हो गया है। अब भाषावाद और क्षेत्रवाद की राजनीति उसे और खोखला किये जा रही है। अगर ठाकरे परिवार की क्षेत्रियतावाद और भाषावाद की राजनीति जो कि असंवैधानिक राजनीति है पर रोक न लगाई । तो इस प्रकार की राजनीति भारत के अन्य राज्यों में भी पनप सकती है जिसके परिणाम अत्यधिक भयभीत करने वाले होगें। देश की औद्योगिक राजधानी मुम्बई जिसे सारा देश आमची मुम्बई कहता है वह आमची मुम्बई न रहकर मराठी या ठाकरे परिवार की मुम्बई मात्र रह जायेगी।

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