Friday, June 18, 2010

नक्सलवाद की गंभीर होती समस्या....

नक्सलवाद की समस्या कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्या है। इसका समाधान राजनीतिक तरीकों से आर्थिक व सामाजिक विकास द्वारा ही हो सकता है। यदि नक्सलवाद से निजात पाना है तो इसके कारणों और उपायों के हर पहलू पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करना होगा।
हमें नक्सलवाद के साथ-साथ भारत के वर्तमान राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक व आर्थिक परिवेश को भी समझना होगा।
नक्सलवाद सषस्त्र-विद्रोह की रणनीति से सत्ता हथियाने की साम्यवादी विचारधारा का वैकल्पिक नाम है।
इसकी शुरुआत 1948 में तेलंगाना-संघर्ष के नाम से किसानो के सशस्त्र विद्रोह से हुई थी। उस समय तेलंगाना में 2500 गांव साम्यवादी कम्यून के रूप में माओत्सेतुंग की न्यू डेमोक्रेसी की विचारधारा पर आधारित रणनीति के तहत संगठित हो चुके थे। भारतीय सेना ने हैदराबाद रियासत पर कब्जा करते समय इस आंदोलन का दमन किया था।
भारत-चीन युद्ध 1962 के बाद 1964 में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी साम्यवाद की रूसी और चीनी विचारधारा और रणनीति के मतभेदों के कारण दो गुटों में विभाजित हो गई। चीनी विचारधारा वाले गुट ने मार्क्सिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाकर अनुकूल क्रांतिकारी परिस्थिति के आने तक सशस्त्र संघर्ष को टालकर चुनाव में भाग लेने का निर्णय किया। जब उसने 1967 के चुनाव में भाग लेकर बंगला कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में संविद सरकार बनाई तब चारू मजूमदार ने मार्क्सिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी पर क्रांति के साथ विश्वासघात और नवसाम्राज्यवादी, सामंती तथा पूजीवादी व्यवस्था का दलाल होने का आरोप लगाकर मार्क्स-लेनिन-माओ की विचारधारा के आधार पर नया गुट बना लिया। इसी वर्ष दार्जिलिंग जिले के एक गांव नक्सलबाड़ी में जब एक आदिवासी युवक न्यायालय के आदेश पर अपनी जमीन जोतने गया तो उसपर जमीदारों के गुंडों ने हमला कर दिया।
आदिवासी किसानों ने कानू सन्याल और चारू मजूमदार के नतृत्व में जमीदारों के कब्जे की जमीन छीनने का सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया।
नक्सलबाड़ी गांव से शुरू होने के कारण इस संघर्ष को नक्सलवाद कहा जाने लगा। लेकिन मार्क्स-लेनिन-माओ के विचार मानने के बावजूद कानू सन्याल और चारू में रणनीति का मतभेद था। कानू सन्याल जनता को विचारों से लैस कर लड़ाई के लिए तैयार करने की बात कहते थे। लेकिन चारू सीधे दुश्मनों की हत्या के पक्ष में थे।
नक्सलबाड़ी का विद्रोह कानू सान्याल के नेतृत्व में किसानों का विद्रोह था। लेकिन पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद का विकास चारू के विचारों के आधार पर आगे बढ़ा और गांव से शहरों तक फैल गया। इसमें नक्सलवादियों और शासन द्वारा व्यापक हिंसा हुई। यह आंदोलन पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा निर्ममता के साथ दबा दिया गया। लेकिन इसकी जड़ें दूसरे प्रदेशों में जमने लगीं।
1980 में आंध्रप्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में पीपुल्स वार ग्रुप के नाम से नक्सलवाद का दूसरा आंदोलन शुरू हुआ जो उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ तक फैल गया। जिस तरह माओ ने सशस्त्र क्रांति द्वारा चीन की सत्ता हाथ में ली थी, नक्सलवादी उसी तरह नेपाल और भारत की सत्ता हथियाने का सपना देखते हुए पिछले कुछ ही वर्षों में 9 प्रदेशों के 76 जिलों से बढ़कर 12 प्रदेशों के 118 जिलों में फैल गए हैं। नक्सलवाद के जन्म से अबतक विचारधारा और रणनीति के आपसी मतभेदों के चलते उनमें अनेक गुट बने। लेकिन 21 सितंबर 2004 को प्रमुख गुटों पीपुल्स वार ग्रुप और भारतीय माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर ने आपसी समन्वय से एक नई पार्टी कम्यूनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (माओवादी) गठित कर ली। लेकिन कानू सन्याल का सीपीआई(माले) लिबरेशन गुट अभी अलग है और वह माओवादी दल की रणनीति को अराजक मानता है।
नक्सलवादी भारतीय संविधान को नहीं मानते। वे भारत की पूरी राजनैतिक व न्याय व्यवस्था को साम्राज्यवाद और सामंतवाद की कठपुतली और भारत के लोकतंत्र को वे छद्म लोकतंत्र कहते हैं। जो भी हो वे नेपाल से बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ होते हुए आंध्रप्रदेश तक एक सघन लाल गलियारा बनाने की फिराक में हैं।
नक्सलवादी कौन हैं, क्या कहीं बाहर से आये हैं, या हमीं लोगों ने जिसे मनुष्य मानने से इंकार किया उसी की प्रतिक्रिया है ? जिन जगहों पर आज़ादी के 62 साल बाद भी जाने के लिये सड़क, स्वास्थ्य सेवा तो बहुत बाद की बात है, दो जून की रोटी भी उपलब्ध नहीं करा सके, जिन्हें शिक्षा, मकान का सपना भी नहीं दिखा सके, उनके प्रतिरोध को कानून व्यवस्था का मामला बता कर उसी तरह निपटना सरासर गलत होगा.
इन खाये-पीये-अघाये लोगों को आदिवासियोंका मानवाधिकार कोई माने नहीं रखता. वहां कितने बलात्कार और मुकदमा चलाये बिना हत्या हो रही है, उनकी कहीं गिनती नहीं है. हम संसद पर हमला करने वाले को फांसी की सजा के बाद भी बिरयानी खिला सकते हैं लेकिन अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को बर्दाश्त नहीं कर सकते. क्योंकि उनका तरीका गलत है. देश की सुरक्षा के लिये सैनिकों का इस्तेमाल होना चाहिए या देश के अंदर ? ये सब कुछ जमीन के अंदर खनिज के लिये हो रहा है. वास्तविकता ये है कि सरकार को न तो उन इलाकों के विकास से मतलब है और ना ही नक्सलवादियों से।
केंद्रीय गृहमंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में वर्ष 2005 में नक्सली हिंसा की 1608 घटनाओं की तुलना में वर्ष 2006 में 1509 घटनाएं हुईं जो 6.15 प्रतिशत की कमी दर्शाती हैं। लेकिन हताहतों की संख्या कम नहीं हुई है। केंद्रीय गृहमंत्रालय के अनुसार वर्ष 2006 मं देश की कुल घटनाओं का 47.38 प्रतिषत घटनाएं और कुल हताहतों के 57.22 प्रतिशत अकेले छत्तीसगढ़ में हुए। आंध्रप्रदेश सहित अनेक जिलों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में कमी आई है लेकिन उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बढ़ोत्तरी हुई है।
मनमोहन सिंह जब से देश के प्रधानमंत्री बनें है तब से वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है. साठ के दशक के अर्थशास्त्री मनमोहन सिह भी शिक्षण संस्थानों में डिग्री लेने वाले देश के दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह पहले नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखने वालों में रहे हैं।


नक्सल समस्या आदिवासियों के शोषण के खिलाफ स्वयं आदिवासियों द्वारा किया जा रहा लड़ाई है यह मानना केवल अज्ञान ही होगा । शोषित वर्ग के मसीहा बनने वाले नक्सली इस पनागाह मे क्या करते है यह मानवाधिकारविदों को तथा दूर शहरों मे बैठने वाले पत्रकारों को नही पता है । कुछ साधारण ज्ञान के बाते है जिस पर गौर करने पर नक्सली किनका हितैशी है यह स्पष्ट हो जाता है ।
नक्सली आदिवासियों के कितने बड़े हितैशी हैं इस बात का प्रमाण उन्होनें कुछ दिनों पहले दंतेवाडा जिले में खुनी खेल खेलते हुए 44 बेगुनाह लोगों की हत्या कर दी। नक्सली हमले में एक साथ इतनी बडी संख्या में लोगों के मारे जाने की संभवत यह पहली घटना थी हालांकि करिब डेढ़ महिना पहले नक्सलियों ने इसी इलाके में 76 जवानों की हत्या कर सुरक्षा बलों को करारा झटका दिया था। देश की जनता दंतेवाड़ा के दर्द से अभी उबर भी नही पाई थी कि नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में रेल की पटरी को विस्फोट कर ध्वस्थ कर दिया जिसके कारण हावड़ा से मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस का इंजन और 12 डिब्बे पटरी से उतर गए और सामने से आ रही एक मालगाड़ी से इस से टकरा गई थी। जिसके कारण सैकड़ो लोगों की जान चली गई और लगभग हजारों लोग घायल हो गए। इस साल के पांच महीनों में ही नक्सनलियों ने करीब 500 लोगों की जान ले ली है। इतना सब कुछ होने पर सरकार इसे कानून-व्यनवस्था0 की समस्या मान रही है। इससे निपटने के लिए वह सेना को उतारने जैसे सख्तग कदम के बारे में सोच भी नहीं रही है। नक्स ली सरकार को लगातार अपनी बढ़ती ताकत का एहसास भी करा रहे हैं। 2007 में जहां उन्हों्ने 1528 वारदात कर 620 लोगों की जान ली, वहीं अगले साल 1673 वारदात अंजाम देकर नक्सनलियों ने 753 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसके अगले साल देश में नक्स ली हिंसा की 2414 घटनाएं हुईं और इनमें 928 लोगों की जानें गईं।

नक्स लियों के हाथों मरने वाले सुरक्षा बलों के लोगों की संख्या2 भी लगातार बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2007 में 190, 2008 में 234 और 2009 में सुरक्षा बलों के 314 लोग नक्सरली हिंसा की भेंट चढ़े।

साफ है कि पुलिस या अर्द्धसैनिक बल नक्स0लियों को काबू करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह बात सालों से साबित हो रही है। इसके बावजूद सरकार नक्सिलियों से निपटने के लिए सेना के इस्तेेमाल से साफ मुकर रही है। क्यान मौजूदा हालात के मद्देनजर सरकार का यह रुख सही ठहराया जा सकता है?
1) इतने दशकों की लडाई में हजारों की संख्या में नक्सलियों द्वारा ग्रामीणों की निर्मम हत्यायें किये गये है क्या यह सब ग्रामीण शोषित वर्ग के है या शोषण करने वाले वर्गों से है?
2) केवल इंफार्मर होने का अनुमान से कितने ग्रामीणों को मौत की नींद सुलाया जाता है (नक्सलियों द्वारा) क्या यदि किसी भय से एक ग्रामीण ने पुलिस का साथ दिया तो वे अपने जीने का अधिकार खो जाता है?
3) यदि नक्सली शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वालों में से है तो उनका यहा के ठेकेदारों तथा राजनेताओं खासकर यहा के विधायकों से कभी टकराव क्यों नही होती? इन्हे नियमित रूप से यहां ले भ्रष्ट अधिकारियों से ठेकेदारों से तथा नेताओं से बतौर भेंट (वा शुल्क) लाखों रूपये मिलता है .. इसे कोई झुठला सकते है।
4) जब चाहे तब सडक बन्द करना, टावर उडाकर बिजली बन्द कर देना इत्यादी कृत्यों से क्या केवल शोषित वर्ग को ही वे सजा दे रहे हैं ? क्या यह शोषण के खिलाफ की जा रही पवित्र युद्ध मानना होगा
5) दशकों का अपनी अस्तित्व में बस्तर के अंचलों में आदिवासी के पक्ष मे इन तथाकथित आदिवासी (के) मित्रों द्वारा चलाया गया एक सफल आन्दोलन कोई गिना सकते है?
6) आदिवासी को पढ़ने नही देना, नौकरी नही करने देना आखिरकार शासन प्रायोजित विकासकारी कार्यों मे शामिल नही होना देना यह सब क्या शोषितों के पक्ष मे ही किया जा रहा है?
7) सरकारी अमलों को तेन्दुपत्ता तुडवाने से मनाही है पर ठेकेदार आराम से तोड लेते है.. क्या यह भी शोषण के खिलाफ लड़ाई ही समझना है?
अब ये निर्णय सरकार का है कि वो इस समस्या से किस प्रकार और कब तक निपटती है क्योंकि देश की जनता के सामने नक्सलियों का मुखौटा खुल चुका है ?

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