Friday, June 18, 2010

ग्लोबल वॉर्मिंग - पृथ्वी के वर्चस्व की लडाई

ग्लोबल वॉर्मिंग एक वैश्विक समस्या बन गइ है इस समस्या के समाधान की कोशिश लगातार जारी है। अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर कई सम्मेलन भी आयोजित किए गए हैं और इन सम्मेलनो में कई देशो के प्रमुखों ने ग्लोबल वॉर्मिंग के बढते हुए प्रभाव पर चिंता जताई है और इस समस्या के समाधान के लिए कई सुझाव दिए हैं।
इग्लैण्ड में औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद मशिनीकरण का युग प्रारम्भ होता है जो देखते ही देखते पुरे विश्व में फैल जाता है। यह प्रक्रिया आज भी बदस्तुर चल रही है। इसका परिणाम हुआ कि वायुमंडल में कार्बनडाइआक्साइड, कार्बनमोनोआक्साइड, नाइट्रसआक्साइड, मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन आदि की मात्रा वायुमंडल में बढ़ गई। इन गैसों का एक परत बन चुका है जिसके कारण सूर्य की किरणें जब पृथ्वी पर पड़ती है और जब टकराकर वापस लौटती है तो इन गैसों की परत पृथ्वी से लौटने वाली उष्मा को अवशोषित कर लेती है और वायुमंडल से बाहर जाने नही देती हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि वायुमंडल का तापमान धीरे धीरे बढने लगा। वायुमंडल के ताप का बढना ही ग्लोबल वॉर्मिंग कहलाता है।
ग्लोबल वार्मिंग में कार्बनडाइआक्साइड की महत्वपुर्ण भुमिका रही है। वायुमंडल में कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा में वृद्धि के लिए हमारी आधुनिक जीवन शैली कम जिम्मेदार नही है। तेजी से विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था में उर्जा आवश्यक्ता की मांग को बढ़ा दिया। प्रतिदिन निजी गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है और जैविक ईधंन की खपत भी उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है । इन गाडियों से निकलने वाला धुआं वायुमंडल में CO2 की मात्रा बढ़ा रहा है। इसके अलावा थर्मल पावर स्टेशन भी CO2 की मात्रा को बढाने में महत्वपुर्ण भुमिका रही है। दूसरी तरफ फ्रीज और एअरकंडीसन में उपयोग होने वैला CFC गैस वायुमंडल में उपस्थित ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही है। ओजोन परत में हुइ छेद के कारण सूर्य से निकलने वाली कॉसमिक किरन सिधे पृथ्वी पर पड़ता है इससे बहुत सारी बिमारियां (कैंसर, त्वचा रोग आदि) के होने का खतरा बना रहता है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए मानविय गतिविधियों को जिम्मेदार माना गया है यह बात आइपीसीसी के 2007 के रिर्पोट में भी कही गई है। विकास की प्रक्रिया में मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का आंधाधुन दोहन किया । प्रकृति में जो संतुलन स्थापित था वह मानव की उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण टुट गया। अंधाधुन जंगल काटे गए, नदियॉं दुषित हो गईं , अत्याधिक उर्वरको के उपयोग के कारण भुमिगत जल दुषित हो गया अनेक नए कल-कारखाने लगाए गए। इन सब के कारण वायुमंडल के तापमान में और अधिक वृद्धी हुई।
पृथ्वी की बढ़ते हुए तापमान के कारण विश्व जगत को चिंतित होना स्वभाविक ही है। आज ग्लोबल वॉर्मिंग एक गंभीर समस्या का रुप ले चुकी है। 70 के दशक में ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रभाव दिखने लगा । इस समस्या के समाधान के लिए पहली बार स्काटलैण्ड में विकसित देशों का सम्मेलन आयोजित किया गया था। वायु प्रदूषण और मानवीय कार्यों से पर्यावरण में बदलाव के मुद्‌दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पहला संगठित प्रयास जेनेवा कन्वेंशन ऑन लॉन्ग रेंज ट्रांस बाउंड्री एयर पॉल्यूशन, जिसे अक्सर सीएलआरटीएपी के नाम से पुकारा जाता है, के रूप में हमारे सामने आया. यह मुख्य रूप से वायु प्रदूषण के खिलाफ विश्व समुदाय को तैयार करने के लिए आयोजित किया गया था. पर्यावरण को वायु प्रदूषण से बचाना और धीरे-धीरे इसे पूरी तरह खत्म करना इसका उद्‌देश्य था. जेनेवा कन्वेंशन के आयोजन के पीछे दो महत्वपूर्ण कारक थे. इसकी सबसे बड़ी वजह थी दुनिया भर में, और खासकर यूरोप में पैदा हो रही पर्यावरणीय समस्याएं, जैसे तालाबों, झीलों आदि का सूखना या पानी का गंदा होना आदि, और वैज्ञानिकों की एकमत राय कि इसके लिए वायु प्रदूषण ज़िम्मेदार है. इसकी दूसरी वजह थी 1972 में युनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन द ह्यूमन एंवायरेन्मेंट इन स्टॉकहोम (स्टॉकहोम कन्वेंशन) के आयोजन के सिलसिले में दुनिया भर के नीति-निर्माताओं का एक मंच पर जमा होना. हालांकि, यह कहना बेमानी नहीं होगा कि ग्लोबल वॉर्मिंग के बड़े ख़तरे से निबटने के लिए स्टॉकहोम घोषणापत्र में कुछ खास नहीं कहा गया. 51 सदस्यों की सहभागिता वाले इस सम्मेलन ने सल्फर और नाइट्रोजन उत्सर्जन जैसे पर्यावरण पर बुरा असर डालने वाले कई मुद्‌दों पर विचार किया, लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग का ख़तरा जिस गंभीरता के साथ हमारे सामने मुंह बाये खड़ा है, उससे मुक़ाबला करने के लिए इसमें कुछ ख़ास व्यवस्था नहीं की गई.
ग्लोबल वॉर्मिंग के गंभीर ख़तरे को नियंत्रित करने के लिए पहला बड़ा और सीधा क़दम 1992 के अर्थ समिट (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एंवॉयरेन्मेंट एंड डेवलपमेंट) के रूप में सामने आया, जिसे रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है. अभूतपूर्व रूप से सफल रहे इस सम्मेलन में 172 देशों ने भाग लिया और इनमें से 108 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें शरीक हुए।
जलवायु परिवर्तन को लेकर किए गए इस महत्वपूर्व शोध में पता चला है कि 2100 तक दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर डेढ़ मीटर तक बढ़ सकता है. अंटार्कटिका का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां सदियों से जमी बर्फ का बड़ा हिस्सा और तेज़ी से गल रहा है. इसके लिए ग्लोबल वॉर्मिंग को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.
साइंटिफिक कमेटी ऑन अंटार्कटिक रिसर्च के मुताबिक वायुमंडल को गर्म करने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें अपने उच्चतम स्तर तक पहुंच गई हैं. इसकी वजह से दुनिया और महासागर तेज़ी से गर्म हो रहे हैं. समुद्रों का जलस्तर बढ़ने की वजह से अनाज भी कम पड़ता जा रहा है.
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के अंतर्गत जर्नल जियोफिसिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित स्टडी ऑफ एट्मॉस्फेरंड ओशियन व नेशनल ओशियनिक एंड एट्मॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन की पेसिफिक मरीन एनवायर्नमेंटल लैब की नई संयुक्त रिपोर्ट में भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में गर्मियों के दौरान आर्कटिक समुद्र में फैले बर्फीले क्षेत्रों में इस बार भारी कमी देखी गई है, पिछले 30 वर्षों में 'समर सी ऑइस' अनुमानित 2.8 मिलियन स्क्वेयर मील घट गई है।

नेशनल स्नो एंड ऑइस डाटा सेंटर द्वारा जारी किए गए आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सितम्बर में 1.8 मिलियन स्क्वेयर मील बर्फ की चादर आर्कटिक पर फैली थी जो अब तक का दूसरा सबसे फैलाव था। इससे पहले 2007 में सबसे कम दर्ज किया गया फैलाव 1.65 मिलियन स्क्वेयर मील रहा है।

इसी तरह सर्दी के दिनों में आर्कटिक पर अधिकतम 5.8 मिलियन स्क्वेयर मील पर बर्फ की चादर फैली थी जो औसत से 278,000 स्क्वेयर मील कम थी। पिछले साल बर्फ की सतह पाँचवें सबसे कम क्षेत्रफल वाले फैलाव के रूप में दर्ज की गई, यहाँ यह बात ध्यान देने वाली है कि सभी बड़ी गिरावटें पिछले 6 वर्षों में ही दर्ज की गई हैं।

हालाँकि अभी बहुत सी बर्फ कनाडा और ग्रीनलैंड में बची है मगर अलास्का तथा रूस के बर्फीले क्षेत्रों पर ग्लोबल वॉर्मिंग का असर पड़ रहा है। ग्लोबल वॉर्मिंग के अलावा इनसानी कार्यकलापों द्वारा होने वाले जलवायु परिवर्तन से चिंतित पर्यावरणविदों ने इस मुद्दे पर ओबामा प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। लंदन में हुए जी-20 सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भी चर्चा हुई।

इन चेतावनियों को अनसुना करना संपूर्ण पृथ्वी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, पर इस दिशा में कई सरकारें तथा गैरसरकारी संगठन कार्य कर रहे हैं और हाल ही में हुए जलवायु परिवर्तन ने विकसित देशों को भी इस ओर सोचने पर मजबूर किया था।

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