Friday, June 18, 2010

नक्सलवाद की गंभीर होती समस्या....

नक्सलवाद की समस्या कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्या है। इसका समाधान राजनीतिक तरीकों से आर्थिक व सामाजिक विकास द्वारा ही हो सकता है। यदि नक्सलवाद से निजात पाना है तो इसके कारणों और उपायों के हर पहलू पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करना होगा।
हमें नक्सलवाद के साथ-साथ भारत के वर्तमान राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक व आर्थिक परिवेश को भी समझना होगा।
नक्सलवाद सषस्त्र-विद्रोह की रणनीति से सत्ता हथियाने की साम्यवादी विचारधारा का वैकल्पिक नाम है।
इसकी शुरुआत 1948 में तेलंगाना-संघर्ष के नाम से किसानो के सशस्त्र विद्रोह से हुई थी। उस समय तेलंगाना में 2500 गांव साम्यवादी कम्यून के रूप में माओत्सेतुंग की न्यू डेमोक्रेसी की विचारधारा पर आधारित रणनीति के तहत संगठित हो चुके थे। भारतीय सेना ने हैदराबाद रियासत पर कब्जा करते समय इस आंदोलन का दमन किया था।
भारत-चीन युद्ध 1962 के बाद 1964 में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी साम्यवाद की रूसी और चीनी विचारधारा और रणनीति के मतभेदों के कारण दो गुटों में विभाजित हो गई। चीनी विचारधारा वाले गुट ने मार्क्सिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाकर अनुकूल क्रांतिकारी परिस्थिति के आने तक सशस्त्र संघर्ष को टालकर चुनाव में भाग लेने का निर्णय किया। जब उसने 1967 के चुनाव में भाग लेकर बंगला कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में संविद सरकार बनाई तब चारू मजूमदार ने मार्क्सिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी पर क्रांति के साथ विश्वासघात और नवसाम्राज्यवादी, सामंती तथा पूजीवादी व्यवस्था का दलाल होने का आरोप लगाकर मार्क्स-लेनिन-माओ की विचारधारा के आधार पर नया गुट बना लिया। इसी वर्ष दार्जिलिंग जिले के एक गांव नक्सलबाड़ी में जब एक आदिवासी युवक न्यायालय के आदेश पर अपनी जमीन जोतने गया तो उसपर जमीदारों के गुंडों ने हमला कर दिया।
आदिवासी किसानों ने कानू सन्याल और चारू मजूमदार के नतृत्व में जमीदारों के कब्जे की जमीन छीनने का सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया।
नक्सलबाड़ी गांव से शुरू होने के कारण इस संघर्ष को नक्सलवाद कहा जाने लगा। लेकिन मार्क्स-लेनिन-माओ के विचार मानने के बावजूद कानू सन्याल और चारू में रणनीति का मतभेद था। कानू सन्याल जनता को विचारों से लैस कर लड़ाई के लिए तैयार करने की बात कहते थे। लेकिन चारू सीधे दुश्मनों की हत्या के पक्ष में थे।
नक्सलबाड़ी का विद्रोह कानू सान्याल के नेतृत्व में किसानों का विद्रोह था। लेकिन पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद का विकास चारू के विचारों के आधार पर आगे बढ़ा और गांव से शहरों तक फैल गया। इसमें नक्सलवादियों और शासन द्वारा व्यापक हिंसा हुई। यह आंदोलन पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा निर्ममता के साथ दबा दिया गया। लेकिन इसकी जड़ें दूसरे प्रदेशों में जमने लगीं।
1980 में आंध्रप्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में पीपुल्स वार ग्रुप के नाम से नक्सलवाद का दूसरा आंदोलन शुरू हुआ जो उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ तक फैल गया। जिस तरह माओ ने सशस्त्र क्रांति द्वारा चीन की सत्ता हाथ में ली थी, नक्सलवादी उसी तरह नेपाल और भारत की सत्ता हथियाने का सपना देखते हुए पिछले कुछ ही वर्षों में 9 प्रदेशों के 76 जिलों से बढ़कर 12 प्रदेशों के 118 जिलों में फैल गए हैं। नक्सलवाद के जन्म से अबतक विचारधारा और रणनीति के आपसी मतभेदों के चलते उनमें अनेक गुट बने। लेकिन 21 सितंबर 2004 को प्रमुख गुटों पीपुल्स वार ग्रुप और भारतीय माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर ने आपसी समन्वय से एक नई पार्टी कम्यूनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (माओवादी) गठित कर ली। लेकिन कानू सन्याल का सीपीआई(माले) लिबरेशन गुट अभी अलग है और वह माओवादी दल की रणनीति को अराजक मानता है।
नक्सलवादी भारतीय संविधान को नहीं मानते। वे भारत की पूरी राजनैतिक व न्याय व्यवस्था को साम्राज्यवाद और सामंतवाद की कठपुतली और भारत के लोकतंत्र को वे छद्म लोकतंत्र कहते हैं। जो भी हो वे नेपाल से बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ होते हुए आंध्रप्रदेश तक एक सघन लाल गलियारा बनाने की फिराक में हैं।
नक्सलवादी कौन हैं, क्या कहीं बाहर से आये हैं, या हमीं लोगों ने जिसे मनुष्य मानने से इंकार किया उसी की प्रतिक्रिया है ? जिन जगहों पर आज़ादी के 62 साल बाद भी जाने के लिये सड़क, स्वास्थ्य सेवा तो बहुत बाद की बात है, दो जून की रोटी भी उपलब्ध नहीं करा सके, जिन्हें शिक्षा, मकान का सपना भी नहीं दिखा सके, उनके प्रतिरोध को कानून व्यवस्था का मामला बता कर उसी तरह निपटना सरासर गलत होगा.
इन खाये-पीये-अघाये लोगों को आदिवासियोंका मानवाधिकार कोई माने नहीं रखता. वहां कितने बलात्कार और मुकदमा चलाये बिना हत्या हो रही है, उनकी कहीं गिनती नहीं है. हम संसद पर हमला करने वाले को फांसी की सजा के बाद भी बिरयानी खिला सकते हैं लेकिन अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को बर्दाश्त नहीं कर सकते. क्योंकि उनका तरीका गलत है. देश की सुरक्षा के लिये सैनिकों का इस्तेमाल होना चाहिए या देश के अंदर ? ये सब कुछ जमीन के अंदर खनिज के लिये हो रहा है. वास्तविकता ये है कि सरकार को न तो उन इलाकों के विकास से मतलब है और ना ही नक्सलवादियों से।
केंद्रीय गृहमंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में वर्ष 2005 में नक्सली हिंसा की 1608 घटनाओं की तुलना में वर्ष 2006 में 1509 घटनाएं हुईं जो 6.15 प्रतिशत की कमी दर्शाती हैं। लेकिन हताहतों की संख्या कम नहीं हुई है। केंद्रीय गृहमंत्रालय के अनुसार वर्ष 2006 मं देश की कुल घटनाओं का 47.38 प्रतिषत घटनाएं और कुल हताहतों के 57.22 प्रतिशत अकेले छत्तीसगढ़ में हुए। आंध्रप्रदेश सहित अनेक जिलों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में कमी आई है लेकिन उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बढ़ोत्तरी हुई है।
मनमोहन सिंह जब से देश के प्रधानमंत्री बनें है तब से वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है. साठ के दशक के अर्थशास्त्री मनमोहन सिह भी शिक्षण संस्थानों में डिग्री लेने वाले देश के दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह पहले नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखने वालों में रहे हैं।


नक्सल समस्या आदिवासियों के शोषण के खिलाफ स्वयं आदिवासियों द्वारा किया जा रहा लड़ाई है यह मानना केवल अज्ञान ही होगा । शोषित वर्ग के मसीहा बनने वाले नक्सली इस पनागाह मे क्या करते है यह मानवाधिकारविदों को तथा दूर शहरों मे बैठने वाले पत्रकारों को नही पता है । कुछ साधारण ज्ञान के बाते है जिस पर गौर करने पर नक्सली किनका हितैशी है यह स्पष्ट हो जाता है ।
नक्सली आदिवासियों के कितने बड़े हितैशी हैं इस बात का प्रमाण उन्होनें कुछ दिनों पहले दंतेवाडा जिले में खुनी खेल खेलते हुए 44 बेगुनाह लोगों की हत्या कर दी। नक्सली हमले में एक साथ इतनी बडी संख्या में लोगों के मारे जाने की संभवत यह पहली घटना थी हालांकि करिब डेढ़ महिना पहले नक्सलियों ने इसी इलाके में 76 जवानों की हत्या कर सुरक्षा बलों को करारा झटका दिया था। देश की जनता दंतेवाड़ा के दर्द से अभी उबर भी नही पाई थी कि नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में रेल की पटरी को विस्फोट कर ध्वस्थ कर दिया जिसके कारण हावड़ा से मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस का इंजन और 12 डिब्बे पटरी से उतर गए और सामने से आ रही एक मालगाड़ी से इस से टकरा गई थी। जिसके कारण सैकड़ो लोगों की जान चली गई और लगभग हजारों लोग घायल हो गए। इस साल के पांच महीनों में ही नक्सनलियों ने करीब 500 लोगों की जान ले ली है। इतना सब कुछ होने पर सरकार इसे कानून-व्यनवस्था0 की समस्या मान रही है। इससे निपटने के लिए वह सेना को उतारने जैसे सख्तग कदम के बारे में सोच भी नहीं रही है। नक्स ली सरकार को लगातार अपनी बढ़ती ताकत का एहसास भी करा रहे हैं। 2007 में जहां उन्हों्ने 1528 वारदात कर 620 लोगों की जान ली, वहीं अगले साल 1673 वारदात अंजाम देकर नक्सनलियों ने 753 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसके अगले साल देश में नक्स ली हिंसा की 2414 घटनाएं हुईं और इनमें 928 लोगों की जानें गईं।

नक्स लियों के हाथों मरने वाले सुरक्षा बलों के लोगों की संख्या2 भी लगातार बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2007 में 190, 2008 में 234 और 2009 में सुरक्षा बलों के 314 लोग नक्सरली हिंसा की भेंट चढ़े।

साफ है कि पुलिस या अर्द्धसैनिक बल नक्स0लियों को काबू करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह बात सालों से साबित हो रही है। इसके बावजूद सरकार नक्सिलियों से निपटने के लिए सेना के इस्तेेमाल से साफ मुकर रही है। क्यान मौजूदा हालात के मद्देनजर सरकार का यह रुख सही ठहराया जा सकता है?
1) इतने दशकों की लडाई में हजारों की संख्या में नक्सलियों द्वारा ग्रामीणों की निर्मम हत्यायें किये गये है क्या यह सब ग्रामीण शोषित वर्ग के है या शोषण करने वाले वर्गों से है?
2) केवल इंफार्मर होने का अनुमान से कितने ग्रामीणों को मौत की नींद सुलाया जाता है (नक्सलियों द्वारा) क्या यदि किसी भय से एक ग्रामीण ने पुलिस का साथ दिया तो वे अपने जीने का अधिकार खो जाता है?
3) यदि नक्सली शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वालों में से है तो उनका यहा के ठेकेदारों तथा राजनेताओं खासकर यहा के विधायकों से कभी टकराव क्यों नही होती? इन्हे नियमित रूप से यहां ले भ्रष्ट अधिकारियों से ठेकेदारों से तथा नेताओं से बतौर भेंट (वा शुल्क) लाखों रूपये मिलता है .. इसे कोई झुठला सकते है।
4) जब चाहे तब सडक बन्द करना, टावर उडाकर बिजली बन्द कर देना इत्यादी कृत्यों से क्या केवल शोषित वर्ग को ही वे सजा दे रहे हैं ? क्या यह शोषण के खिलाफ की जा रही पवित्र युद्ध मानना होगा
5) दशकों का अपनी अस्तित्व में बस्तर के अंचलों में आदिवासी के पक्ष मे इन तथाकथित आदिवासी (के) मित्रों द्वारा चलाया गया एक सफल आन्दोलन कोई गिना सकते है?
6) आदिवासी को पढ़ने नही देना, नौकरी नही करने देना आखिरकार शासन प्रायोजित विकासकारी कार्यों मे शामिल नही होना देना यह सब क्या शोषितों के पक्ष मे ही किया जा रहा है?
7) सरकारी अमलों को तेन्दुपत्ता तुडवाने से मनाही है पर ठेकेदार आराम से तोड लेते है.. क्या यह भी शोषण के खिलाफ लड़ाई ही समझना है?
अब ये निर्णय सरकार का है कि वो इस समस्या से किस प्रकार और कब तक निपटती है क्योंकि देश की जनता के सामने नक्सलियों का मुखौटा खुल चुका है ?

ग्लोबल वॉर्मिंग - पृथ्वी के वर्चस्व की लडाई

ग्लोबल वॉर्मिंग एक वैश्विक समस्या बन गइ है इस समस्या के समाधान की कोशिश लगातार जारी है। अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर कई सम्मेलन भी आयोजित किए गए हैं और इन सम्मेलनो में कई देशो के प्रमुखों ने ग्लोबल वॉर्मिंग के बढते हुए प्रभाव पर चिंता जताई है और इस समस्या के समाधान के लिए कई सुझाव दिए हैं।
इग्लैण्ड में औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद मशिनीकरण का युग प्रारम्भ होता है जो देखते ही देखते पुरे विश्व में फैल जाता है। यह प्रक्रिया आज भी बदस्तुर चल रही है। इसका परिणाम हुआ कि वायुमंडल में कार्बनडाइआक्साइड, कार्बनमोनोआक्साइड, नाइट्रसआक्साइड, मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन आदि की मात्रा वायुमंडल में बढ़ गई। इन गैसों का एक परत बन चुका है जिसके कारण सूर्य की किरणें जब पृथ्वी पर पड़ती है और जब टकराकर वापस लौटती है तो इन गैसों की परत पृथ्वी से लौटने वाली उष्मा को अवशोषित कर लेती है और वायुमंडल से बाहर जाने नही देती हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि वायुमंडल का तापमान धीरे धीरे बढने लगा। वायुमंडल के ताप का बढना ही ग्लोबल वॉर्मिंग कहलाता है।
ग्लोबल वार्मिंग में कार्बनडाइआक्साइड की महत्वपुर्ण भुमिका रही है। वायुमंडल में कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा में वृद्धि के लिए हमारी आधुनिक जीवन शैली कम जिम्मेदार नही है। तेजी से विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था में उर्जा आवश्यक्ता की मांग को बढ़ा दिया। प्रतिदिन निजी गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है और जैविक ईधंन की खपत भी उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है । इन गाडियों से निकलने वाला धुआं वायुमंडल में CO2 की मात्रा बढ़ा रहा है। इसके अलावा थर्मल पावर स्टेशन भी CO2 की मात्रा को बढाने में महत्वपुर्ण भुमिका रही है। दूसरी तरफ फ्रीज और एअरकंडीसन में उपयोग होने वैला CFC गैस वायुमंडल में उपस्थित ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही है। ओजोन परत में हुइ छेद के कारण सूर्य से निकलने वाली कॉसमिक किरन सिधे पृथ्वी पर पड़ता है इससे बहुत सारी बिमारियां (कैंसर, त्वचा रोग आदि) के होने का खतरा बना रहता है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए मानविय गतिविधियों को जिम्मेदार माना गया है यह बात आइपीसीसी के 2007 के रिर्पोट में भी कही गई है। विकास की प्रक्रिया में मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का आंधाधुन दोहन किया । प्रकृति में जो संतुलन स्थापित था वह मानव की उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण टुट गया। अंधाधुन जंगल काटे गए, नदियॉं दुषित हो गईं , अत्याधिक उर्वरको के उपयोग के कारण भुमिगत जल दुषित हो गया अनेक नए कल-कारखाने लगाए गए। इन सब के कारण वायुमंडल के तापमान में और अधिक वृद्धी हुई।
पृथ्वी की बढ़ते हुए तापमान के कारण विश्व जगत को चिंतित होना स्वभाविक ही है। आज ग्लोबल वॉर्मिंग एक गंभीर समस्या का रुप ले चुकी है। 70 के दशक में ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रभाव दिखने लगा । इस समस्या के समाधान के लिए पहली बार स्काटलैण्ड में विकसित देशों का सम्मेलन आयोजित किया गया था। वायु प्रदूषण और मानवीय कार्यों से पर्यावरण में बदलाव के मुद्‌दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पहला संगठित प्रयास जेनेवा कन्वेंशन ऑन लॉन्ग रेंज ट्रांस बाउंड्री एयर पॉल्यूशन, जिसे अक्सर सीएलआरटीएपी के नाम से पुकारा जाता है, के रूप में हमारे सामने आया. यह मुख्य रूप से वायु प्रदूषण के खिलाफ विश्व समुदाय को तैयार करने के लिए आयोजित किया गया था. पर्यावरण को वायु प्रदूषण से बचाना और धीरे-धीरे इसे पूरी तरह खत्म करना इसका उद्‌देश्य था. जेनेवा कन्वेंशन के आयोजन के पीछे दो महत्वपूर्ण कारक थे. इसकी सबसे बड़ी वजह थी दुनिया भर में, और खासकर यूरोप में पैदा हो रही पर्यावरणीय समस्याएं, जैसे तालाबों, झीलों आदि का सूखना या पानी का गंदा होना आदि, और वैज्ञानिकों की एकमत राय कि इसके लिए वायु प्रदूषण ज़िम्मेदार है. इसकी दूसरी वजह थी 1972 में युनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन द ह्यूमन एंवायरेन्मेंट इन स्टॉकहोम (स्टॉकहोम कन्वेंशन) के आयोजन के सिलसिले में दुनिया भर के नीति-निर्माताओं का एक मंच पर जमा होना. हालांकि, यह कहना बेमानी नहीं होगा कि ग्लोबल वॉर्मिंग के बड़े ख़तरे से निबटने के लिए स्टॉकहोम घोषणापत्र में कुछ खास नहीं कहा गया. 51 सदस्यों की सहभागिता वाले इस सम्मेलन ने सल्फर और नाइट्रोजन उत्सर्जन जैसे पर्यावरण पर बुरा असर डालने वाले कई मुद्‌दों पर विचार किया, लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग का ख़तरा जिस गंभीरता के साथ हमारे सामने मुंह बाये खड़ा है, उससे मुक़ाबला करने के लिए इसमें कुछ ख़ास व्यवस्था नहीं की गई.
ग्लोबल वॉर्मिंग के गंभीर ख़तरे को नियंत्रित करने के लिए पहला बड़ा और सीधा क़दम 1992 के अर्थ समिट (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एंवॉयरेन्मेंट एंड डेवलपमेंट) के रूप में सामने आया, जिसे रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है. अभूतपूर्व रूप से सफल रहे इस सम्मेलन में 172 देशों ने भाग लिया और इनमें से 108 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें शरीक हुए।
जलवायु परिवर्तन को लेकर किए गए इस महत्वपूर्व शोध में पता चला है कि 2100 तक दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर डेढ़ मीटर तक बढ़ सकता है. अंटार्कटिका का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां सदियों से जमी बर्फ का बड़ा हिस्सा और तेज़ी से गल रहा है. इसके लिए ग्लोबल वॉर्मिंग को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.
साइंटिफिक कमेटी ऑन अंटार्कटिक रिसर्च के मुताबिक वायुमंडल को गर्म करने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें अपने उच्चतम स्तर तक पहुंच गई हैं. इसकी वजह से दुनिया और महासागर तेज़ी से गर्म हो रहे हैं. समुद्रों का जलस्तर बढ़ने की वजह से अनाज भी कम पड़ता जा रहा है.
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के अंतर्गत जर्नल जियोफिसिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित स्टडी ऑफ एट्मॉस्फेरंड ओशियन व नेशनल ओशियनिक एंड एट्मॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन की पेसिफिक मरीन एनवायर्नमेंटल लैब की नई संयुक्त रिपोर्ट में भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में गर्मियों के दौरान आर्कटिक समुद्र में फैले बर्फीले क्षेत्रों में इस बार भारी कमी देखी गई है, पिछले 30 वर्षों में 'समर सी ऑइस' अनुमानित 2.8 मिलियन स्क्वेयर मील घट गई है।

नेशनल स्नो एंड ऑइस डाटा सेंटर द्वारा जारी किए गए आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सितम्बर में 1.8 मिलियन स्क्वेयर मील बर्फ की चादर आर्कटिक पर फैली थी जो अब तक का दूसरा सबसे फैलाव था। इससे पहले 2007 में सबसे कम दर्ज किया गया फैलाव 1.65 मिलियन स्क्वेयर मील रहा है।

इसी तरह सर्दी के दिनों में आर्कटिक पर अधिकतम 5.8 मिलियन स्क्वेयर मील पर बर्फ की चादर फैली थी जो औसत से 278,000 स्क्वेयर मील कम थी। पिछले साल बर्फ की सतह पाँचवें सबसे कम क्षेत्रफल वाले फैलाव के रूप में दर्ज की गई, यहाँ यह बात ध्यान देने वाली है कि सभी बड़ी गिरावटें पिछले 6 वर्षों में ही दर्ज की गई हैं।

हालाँकि अभी बहुत सी बर्फ कनाडा और ग्रीनलैंड में बची है मगर अलास्का तथा रूस के बर्फीले क्षेत्रों पर ग्लोबल वॉर्मिंग का असर पड़ रहा है। ग्लोबल वॉर्मिंग के अलावा इनसानी कार्यकलापों द्वारा होने वाले जलवायु परिवर्तन से चिंतित पर्यावरणविदों ने इस मुद्दे पर ओबामा प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। लंदन में हुए जी-20 सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भी चर्चा हुई।

इन चेतावनियों को अनसुना करना संपूर्ण पृथ्वी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, पर इस दिशा में कई सरकारें तथा गैरसरकारी संगठन कार्य कर रहे हैं और हाल ही में हुए जलवायु परिवर्तन ने विकसित देशों को भी इस ओर सोचने पर मजबूर किया था।

Friday, April 2, 2010

करके देखो

मुशिकल नहीं है कार्य कुछ भी,
करके देखो,
हौसला हो दिल में अगरकरके देखो ।
पहला कदम राह पर तुमरखके देखोसफलता चूमेगी पैर तुम्हारे, करके देखो॓ ।
कहे कोई तुमसे अगरये है नामुमिकन,कहो तुम जाकर उनसेना, ये तो है मुमिकन ।
मत घबराओ भैया तुम,मन में हिम्मत भरके देखो,
(भरोसा खुद पे करके देखो )हो जाएगा तुमसे भी यह प्रयत्न्न जरा तुम करके देखो॓ ।

एक रुका हुआ फैसला

िकतने बरस बीत गए भैया,क्या चल रहा है अब तक केस ?क्यों रोती रहती तेरी मैया,क्या िमला नहीं कोर्ट का आदेश ?
क्या बताउँ क्या हाल है मेरा,
लुटा समय और धन बहुतेरा,
िफर भी न हो पाया िनपटारा
चक्कर (कोर्ट के) काट-काट मैं हारा !
कभी गवाह है नदारद
तो कभी वकील के िसर में है दर्द ।
कभी जज का हुआ तबादला
तो कभी छुट्िटयों का लंबा िसलिसला ।
तारीखें न िमलने का लफडा,
मैंने तो है अब िसर पकडा ।
जाने कब हल होगा यह मसला
बढेगा कब “एक रूका हुआ फैसला!”