Friday, April 2, 2010

एक रुका हुआ फैसला

िकतने बरस बीत गए भैया,क्या चल रहा है अब तक केस ?क्यों रोती रहती तेरी मैया,क्या िमला नहीं कोर्ट का आदेश ?
क्या बताउँ क्या हाल है मेरा,
लुटा समय और धन बहुतेरा,
िफर भी न हो पाया िनपटारा
चक्कर (कोर्ट के) काट-काट मैं हारा !
कभी गवाह है नदारद
तो कभी वकील के िसर में है दर्द ।
कभी जज का हुआ तबादला
तो कभी छुट्िटयों का लंबा िसलिसला ।
तारीखें न िमलने का लफडा,
मैंने तो है अब िसर पकडा ।
जाने कब हल होगा यह मसला
बढेगा कब “एक रूका हुआ फैसला!”

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